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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

लेख : संजय जोठे

आज चर्चा के लिए संजय जोठे जी का एक लेख प्रस्तुत है। आप सब खुलकर अपने विचार रखें।

दलित प्रतिरोध का गुजरात माडल और ब्राह्मणवाद के अंत की शुरुआत

गुजरात के गौ भक्तों ने दलितों का जो अपमान किया है और जिस तरह से उन्हें सरे आम मारा पीटा है वह अपने आप में बहुत सूचक है. उसकी प्रतिक्रया में पूरे गुजरात के दलित समुदाय में जो एक तरह का अहिंसक आन्दोलन छिड़ गया है वह भी बहुत सूचक है. इन दो घटनाओं और इनके आतंरिक संबंधों सहित इन घटनाओं के पीछे छुपे मनोविज्ञान और समाजशास्त्र को उसके पूरे विस्तार में समझने का समय अब आ गया है. अब निश्चित ही घोषणा की जा सकती है कि ब्राह्मणवाद के दिन पूरे हुए और इतिहास का चक्र घूमकर एक नए भविष्य की तरफ बढ़ चला है. यह घटना एक बड़े परिवर्तन का प्रस्थान बिंदु बन चुकी है. भारत में इतिहास का चक्र बहुत धीरे धीरे घूमता है क्योंकि ब्राह्मणवादी पुराणों और धर्मशास्त्रों के सम्मोहन ने इसकी राह में हमेशा से रोड़े अटकाए हैं. उस सबके बावजूद समय को और समाज को आगे बढ़ने से कभी नहीं रोका जा सकता और आज जो कुछ गुजरात में हो रहा है वह बहुत साफ़ साफ़ हमें बतला रहा है कि पश्चिमी शिक्षा और अंबेडकरवादी मशाल की रोशनी में समय एक ख़ास दिशा में परिपक्व हो चुका है. अब राजनीति भी उसके पीछे घिसटती हुई आ जायेगी. जो राजनेता, धार्मिक सांस्कृतिक संगठन, संस्थाएं, मीडिया और समूह इन घटनाओं को हमेशा दबाती आयीं हैं या खुद ही इन घटनाओं को अंजाम देती आयी हैं वे संगठन समूह और राजनेता भी सार्वजनिक रूप से आंसू बहाने और भाईचारे की अपील करने के लिए मजबूर हो रहे हैं. दो दिन में बहुत सारे नाटक शुरू होंगे जिन्हें समय और इतिहास हमेशा नोट करके रखेगा.
गुजरात के गौ भक्तों और दलितों के मन को एकसाथ समझने की कोशिश करते हैं. ये गौभक्त असल में ब्राह्मणवादी संस्कारों में भीगे हुए वे नौजवान हैं जो अपने दिमाग में एक ख़ास तरह के धर्म, संस्कृति और राष्ट्रवाद की व्याख्या लिए घूमते हैं. इन तीन शब्दों में भी अगर केन्द्रीय बिंदु खोजा जाए तो वो इनका धर्म है. इनका धर्म वर्णाश्रम धर्म है. हिन्दू धर्म जैसी कोई चीज दुनिया में नहीं है यह सरकार और सुप्रीम कोर्ट ने भी मान लिया है और डॉ. अंबेडकर ने तो हिन्दू धर्म को धर्म नहीं बल्कि विशुद्ध राजनीति सिद्ध कर ही दिया है. अब गौर से देखें तो इस वर्णाश्रम धर्म में वर्ण और उसके घिनौने रूप अर्थात “जाति व्यवस्था” का पालन करना ही वास्तविक धर्म है. हिन्दुओं के शास्त्रों में भारत के धर्म और धार्मिक अनुशासन को वर्णाश्रम धर्म ही कहा गया है. इस अर्थ में यह एक सामाजिक नियंत्रण का सबसे शक्तिशाली उपाय है. जाति स्वयं अपने आप में सामाजिक व्यवहारों को नियंत्रित करने का उपाय है. विवाह और व्यवसाय जैसे दो सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक व्यवहारों को एकदम लोहे की दीवारों में कैद करने के लिए ही जाति की उत्पत्ति हुई है और आज भी यही इस व्यवस्था का सबसे बड़ा उपयोग है जिसे ब्राह्मणवादी विचारधारा बरकरार रखना चाहती है. ये दुनिया के ज्ञात इतिहास में सबसे लंबा और सबसे घिनौना दमन है जो आज भी पूरी ठसक के साथ जारी है और सबसे बुरी बात ये है कि समाज का बड़ा हिस्सा इसे इतनी गहराई से आत्मसात कर चुका है कि उसे इसमें कोई बुराई ही नजर नहीं आती. उनके लिए यह एक स्वीकृत बात है कि ये तो जीवन का अनिवार्य अंग है इसमें आश्चर्य कैसा? उन्हें आतंकवाद पर आश्चर्य होता है, बलात्कार पर आश्चर्य होता है दंगों पर आश्चर्य होता है लेकिन छुआछूत और जातीय भेदभाव पर कोई आश्चर्य नहीं होता, जैसे कि यह रोजाना पानी पीने खाना खाने जैसी कोई प्राकृतिक और सहज बात है.
जातिगत भेदभाव और उत्पीडन को समझने के लिए कुछ बड़े नामों की बात करते हैं. स्वामी विवेकानंद का ब्राह्मणवादी हिन्दू बहुत सम्मान करते हैं लेकिन बहुत लोग नहीं जानते कि खुद विवेकानंद जातिगत भेदभाव के बड़े शिकार बने रहे थे. उन्होंने खुद लिखा है कि “समाज सुधारकों की पत्रिका में मैंने देखा कि मुझे शुद्र बताया गया है और चुनौती दी गयी है कि शूद्र सन्यासी कैसे हो सकता है?” इस बात को आगे बढाते हुए विवेकानंद अपना संबंध चित्रगुप्त से जोड़ते हैं और स्वयं को कायस्थ सिद्ध करते हुए अपने प्रति ब्राह्मणों की घृणा को कम करने की कोशिश करते हैं. स्वामी विवेकानंद को यह तक कहना पड़ा था कि “मुझे नीच जाति वालों के प्रति उच्च जाति वालों के अत्याचारों के कैसे-कैसे अनुभव मिले हैं. क्या वह धर्म है जो गरीबों के दुःख दूर नहीं कर सकता? क्या तुम समझते हो कि हमारा धर्म, धर्म कहलाने के लायक है? हमारा धर्म सिर्फ ‘छुओ मत’ में है, जिस देश में लाखों मनुष्य महुए के फूल से पेट भरते हैं, जहां दस-बीस लाख साधू और दस-एक करोड़ ब्राह्मण इन गरीबों का रक्त चूसते हैं, पर उनके सुधार का रत्ती भर प्रयास नहीं करते, वह धर्म है या शैतान का नंगा नाच?”.दूसरा उदाहरण शिवाजी महाराज का है. उन्होंने अपने महान शौर्य से जिस हिन्दवी राज की स्थापना की उसकी शुरुआत के पहले दिन ही उन्हें भयानक रूप से अपमानित होना पड़ा था. महाराष्ट्रीय ब्राह्मणों ने उन्हें शूद्र बताकर उनका राजतिलक करने से साफ़ इनकार कर दिया. इसके बाद बहुत कोशिशों के बाद बहुत धन देने पर बनारस के पंडित गागा भट्ट को बुलाया गया और उन्होंने शिवाजी महाराज का संबंध मेवाड़ के सिसोदिया राजवंश से बताकर उन्हें क्षत्रिय सिद्ध किया और तब जाकर उनका राजतिलक वैदिक रीति से हुआ. मस्तराम कपूर ने अपनी किताब “नैतिक लोकतंत्र की तलाश” में लिखा है कि पचास हजार ब्राह्मणों को चार महीने तक भोजन और स्वर्ण मुद्राओं से परिपूर्ण करने के बाद भी उनके ब्राह्मण मंत्री उन्हें शूद्र मानते रहे. इसी कड़ी में रविन्द्रनाथ टैगोर भी हैं जो पिछड़ी जाति से आते हैं जिन्हें बंगाल में नामशुद्र कहा जाता है, रविन्द्रनाथ को इसी वजह से पुरी के जगन्नाथ मंदिर में जाने से रोक दिया गया था. यहाँ स्वामी विवेकानंद, शिवाजी महाराज और महाकवि रविन्द्रनाथ के शूद्र होने या न होने पर कोई स्पष्ट निर्णय नहीं दिया जा रहा है लेकिन उन्हें उनके समय में किसी भी भांति पिछड़ा या नीचा जरुर माना गया है इसलिए उनके उदाहरण बहुत प्रासंगिक हैं.
ये तीन उदाहरण देखिये आपको ब्राह्मणवाद का घमंड और शूद्रों की मजबूरी एक साथ नजर आएगी. और शूद्र कितना भी शूरवीर और ज्ञानी हो उसका स्वयं में कोई मूल्य नहीं है. उसका मूल्य तभी है जबकि किसी तरह उसका सम्बन्ध इस देश के वर्णाश्रम धर्म की स्वीकृत व्यवस्था के अनुरूप किसी कुल, वर्ण या परम्परा से न जुड़ जाए. यहाँ इंसान नहीं जातियां तौली जाती हैं. इसीलिये डॉ. अंबेडकर ने इस धर्म को त्यागने का निर्णय लिया था और आज की घटनाएँ बताती हैं कि उनका निर्णय कितना सही था और दलितों को भविष्य में क्या करना है.
गुजरात में दलितों पर जो जुल्म हो रहा है उसे इस तरह के इतिहास की निरन्तरता में देखिये, गुजरात के दलितों का दमन एक देशव्यापी घटना का उदाहरण मात्र है. सब जानते हैं कि ज़िंदा गाय की खाल नहीं उतारी जा सकती. अगर चर्मकार समुदाय के युवक बुलाये जाने पर किसी गाय की खल उतार रहे थे तो ये हर दृष्टि से एक निरापद व्यवहार था. पहली बात तो ये कि वर्णाश्रम धर्म ने जो भूमिका उनके लिए तय की वे उसका पालन कर रहे थे. दूसरी बात ये कि वे गाय की ह्त्या नहीं कर रहे थे, पहले ही मर चुकी गाय उन्हें दी गयी थी. अब इस निरापद से व्यवहार में गौ भक्त हिन्दुओं द्वारा एक महापाप को खोजकर इन दलितों पर चढ़ाई कर देना और इसे एक सार्वजनिक रूप दे देना एक गजब की बात है. इसका मतलब ये हुआ कि ये गौभक्त इतने सुनिश्चित रूप से यह जानते हैं कि उनके द्वारा इन दलितों को सार्वजनिक रूप से पुलीस थाने के सामने पीटने पर भी न तो समाज कुछ बोलेगा और ना क़ानून कुछ करेगा. इस बात को ठीक से समझिये, यही असली मुद्दा है. उन गौभक्तों को यह भरोसा है कि उनके इस कारनामे को वृहत्तर समाज से सहमति मिलेगी और पुलिस भी उनका विरोध नहीं करेगी. यहीं इस बात पर भी गौर कीजिये कि पीटे जाते हुए उन दलितों ने डरते हुए हाथ जोड़े थे और इन लोगों से माफी भी माँगी थी. इसका अर्थ ये निकलता है कि उन दलित युवकों को भी पक्का पता है कि आसपास खड़ी भीड़ या पुलिस को उनसे कोई सहानुभूति नहीं मिलने वाली है और उन्हें उनसे अपने हक़ की बात करने का कोई अधिकार नहीं है. इसीलिये वे भी माफ़ी मांगने के लिए मारने वालों से मुखातिब हैं आसपास के लोगों से नहीं. ये सब इस घटना के विडिओ में साफ़ नजर आता है. इससे ऐसा लगता है जैसे कि यह दो अलग अलग राष्ट्रीयताओं के या दो अलग अलग धर्मों के लोगों का संघर्ष है जिसमे एकदूसरे के लिए भयानक घृणा और अविश्वास कूट कूट कर भरा हुआ है. यह घटना एक समाज के दो गुटों के बीच घट रही घटना नजर नहीं आती यहाँ एक गहरा मनोवैज्ञानिक विभाजन साफ़ नजर आता है और सिद्ध करता है कि भारतीय भीड़ किसी भी अर्थ में आज तक एक सभ्य समाज नहीं बन पायी है. राष्ट्र या देश होने की बात तो अभी बहुत दूर है.  
अब इस मार पीट और अपमान की प्रतिक्रया जिस ढंग से हुई है वह और भी ज्यादा रोचक और महत्वपूर्ण है. दलितों ने बाबा साहेब अंबेडकर की रक्तहीन सामाजिक क्रांति की सलाह को मानकर अपनी पहली प्रतिक्रया दर्ज कराइ है. उन्होंने विरोध प्रदर्शन का जो संकेत चुना है वो वर्णाश्रम धर्म की मूल मान्यताओं पर चोट करते हुए इस तथाकथित हिन्दू धर्म के पूरे ढाँचे को ही सवालों के दायरे में ले आता है. मृत गायों के अवशेष सार्वजनिक रूप से हिन्दू समाज के हवाले करना अपने आप में बहुत गहरा और सुविचारित जवाब है, जिन लोगों ने इसकी कल्पना की है उनकी बुद्धिमानी की तारीफ़ करनी होगी. इस उपाय की आंतरिक संरचना बहुत गजब की है और इसमें इस समाज को झकझोरने की बड़ी ताकत है. इसमें इस तथाकथित हिन्दू धर्म के मूल पाखण्ड और शातिर षड्यंत्र को एकदम से बेनकाब करने की शक्ति छुपी हुई है. इस उपाय में जो सवाल उठाया गया है वो ये है कि अगर गाय हिन्दुओं के लिए पवित्र है, या उनकी माता है तो वो ही अपनी माता का क्रियाकर्म करें और उसे ठिकाने लगाएं. गौहत्या को पाप घोषित करने के पीछे जो सांस्कृतिक प्रेस्क्रिप्शन है उसी से यह सलाह भी निकलती है कि गाय एक परम सम्मानित जीव है जिसकी कीमत शूद्र समझे जाने वाले इंसानों से भी अधिक है. इस दशा में पवित्र हिन्दुओं का पहला कर्तव्य है कि वे अपनी परम पवित्र माता को अपमान और दुर्गति से बचाते हुए उसका अंतिम संस्कार अपने हाथों से करके सुपुत्र होने का प्रमाण दें. दलितों द्वारा हिन्दुओं को गौमाता का जिम्मेदार सपूत होने का यह आग्रह एक बहुत भयानक पहल है और एक ऐसा प्रश्न है जिसका उत्तर सोचते हुए ब्राह्मणवाद की मूल संरचना का पोस्टमार्टम अपने आप हो जाएगा और उसमे छुपे कैंसर का बढ़िया निदान भी हो जाएगा.
जैसे ही गौमाता के क्रियाकर्म से ब्राह्मणवादी पल्ला झाडेंगे वैसे ही उनका सनातन पाखण्ड बेनकाब हो जाएगा. जब पर्दा हटेगा तो ये साफ़ नजर आयेगा कि गाय वास्तव में हिन्दुओं के लिए पवित्र है ही नहीं यह तो सिर्फ दलितों और मुसलमानों को दबाये रखने का एक उपकरण मात्र है. अगर हिन्दुओं के सभी गुरु मिलकर भी हिन्दुओं को समझाने की कोशिश करें कि सब लोग अपनी अपनी गायों का क्रियाकर्म अपने हाथ से करें, तब भी उनकी बात कोई नहीं सुनेगा और फिर से सिद्ध होगा कि हिन्दू असल में ऐसी भीड़ हैं जिनको किसी एक बात पर सहमत होना आता ही नहीं और जिसके पास कोई प्राकृतिक नैतिकता या मानवता बोध या न्यायबोध नहीं है. वैसे भी हिन्दुओं के सामने गायें प्लास्टिक और गंदगी खाती रहती हैं इस स्थति को बदलने की उनमे कोई प्रेरणा कभी रही ही नहीं इससे सिद्ध होता है कि ये मुद्दा धर्म का मुद्दा नहीं है और उनका धर्म भी स्वयं में धर्म नहीं है. इस घटना के बाद हिन्दुओं के गाय के प्रति व्यवहार पर सवालों की बारिश होने लगेगी और उनके तथाकथित धर्म के श्रेष्ठ इतिहास और उसकी आधारभूत संरचना ही कटघरे में खड़ी हो जायेगी.
दलितों ने इतनी सूझ बूझ से प्रतिक्रिया देकर इस सड़े हुए समाज की सडांध को एकदम चौराहे पर ला पटका है. वे मरी हुई गायों के अवशेष सामने नहीं ला रहे हैं बल्कि इस मरे हुए और जीवाश्म बन चुके धर्म और संस्कृति के अवशेष सबके सामने ला रहे हैं. अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को भी अब पता चल ही जाएगा कि योग और वेदान्त की बात करने वाले इस समाज में असल में जमीन पर चल क्या रहा है. इस आन्दोलन का परिणाम दूरगामी होगा. गुजरात अपने जिन तथाकथित माडलों के लिए जाना जाता है वे माडल अब बहुत पीछे छूट जायेंगे. दलित प्रतिरोध का ये गुजरात माडल ही भारतीय समाज क्रांति की संभावना को गुजराती दलितों द्वारा दी गयी एक वास्तविक देन साबित होगा. यह बात आज हम सबको नोट करके रख लेनी चाहिए.     
                 
000 संजय जोठे

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टिप्पणियां:-

राहुल चौहान:-
संजय जोठे जी ने अपने लेख में दुनियां की सबसे घृणित तम समस्या 'वर्णा श्रम रोग' को उठाया, जो भारत नाम के इस भूगोल में किंवदंती कथाओ (रामायण) सहित मौजूद आज में भी कायम है।

गुजरात के दलितों ने 'ब्राह्मणवादी संस्कृति के सदियो पुराने सांस्कृतिक कैंसर को चीरा लगा दिया है।

हिन्दू मन इतना बेशर्म हो चूका है जाति भेद को लेकर की उसके अनुयाइयो को पता ही नहीं चलता की वे किस स्वाभाविकता से उसका पालन करे जा रहे है, जो शेष विश्व के लोगो की नजरों में निर्लज्ज शर्म से ज्यादा कुछ नहीं हो सकती।
मुझे आश्चर्य नहीं
एक रिश्तेदार लिखी-पढ़ी महिला ने छुआ-छूत को ये कह कर वैज्ञानिक रूप में जस्टिफाई किया था की , "उन लोगो में सिकल सेल बीमारी हो सकती है"

बहुत ही दमदार लेख

मज़कूर आलम:-
बेहतरीन संजय भाई। बहुत सटीक विश्लेषण। यह तो एक उदहारण है। ऐसा पूरे देश में देखने को मिलता रहा है। सच कहा आपने गाय के नाम पर इंसानी खून बहाने पर ये जानते हैं कि समाज के साथ पुलिस प्रशासन का भी इन्हें सहयोग मिलेगा। इसलिए ये निर्भय होकर कुकृत्य को अंजाम देते हैं।

प्रदीप मिश्रा:-
इस आलेख की भाषा और भी धारदार होनी चाहिए। दलितों पर जितना दर्दनाक और वीभत्स अत्याचार किया गया है। उसके अनुरूप ही तर्क़ और स्थापनाएं चाहिए। पुराने और घिसे हुए तर्क़ों से हम इन आतंककारी मनः स्थितयों को ख़ारिज नहीं कर पाएंगे।

संजय जोठे:-
बहुत शुक्रिया आप सबका... मैं इसे सिरफोड़ भाषा में अधिक आक्रामक बनाना चाहता था, लेकिन चूँकि राउंड टेबल पहले ही मुसीबत में है मैं उनकी मुसीबत नहीं बढ़ाना चाहता था। जब उन्होंने इसपर लिखने का आग्रह किया तब मैंने उनकी मुसीबत को ध्यान में रखकर इसे लिखा। वैसे अक्सर मैं आक्रामक लिखना पसन्द करता हूँ।

कैलाश बनवासी:-
बेहद तार्किक,सटीक,व प्रतिरोधी विशलेषण.प्रतिरोध का यह गुजरात माडल देश भर में प्रचारित हो और अमल हो.इस आंदोलन के लिये तो अब हुंकार लगाई जाय कि सारे दलित एक हो! अब बस बहुत हो चुका सैद्धांतिक प्रतिरोध.जिस निर्णायक मोड़ में आज यह मुद्दा है,उसे इसी निर्णायक तरीके से ही क्रियान्वयन किया जाय.आंदोलन का उग्र और प्रतिरोधी रूप ही कारगर है.बेशक अभी भी उनके साथ सारा वर्चस्वी मध्य व उच्च वर्ग अपने तमाम सहानुभूतिमय भाषणों व इसके तोड़ के लिये तमाम वैधानिक छूटों का सहारा लेते हुए इसे शिथिल करके यथास्थिति कायम रखने की पुरजोर सरकारी कोशिश रहेगी ही.हमलावरों के खिलाफ मामला अनमने,कमजोर चलताऊ धारा लगाना..ये सब आज भी उसी वर्ग के पास है जो ये सब और तेजी से ,खुलकर होने देना चाहते हैं.संजय भाई व बिजुका को हृदय से धन्यवाद ऐसे जरूरी व हस्तक्षेपकारी पोस्ट के लिये़

संजय जोठे:-
अभी भी एक तरह की स्पष्टता तक मैं नहीं पहुँच सका हूँ कि ऐसे मुद्दों पर सदा आक्रामक होना चाहिए या तर्क की गहरी बुनाई करनी चाहिए... मैं दलित बस्तियों का अनुभव कहूँ तो मुझे लगता है वे तर्क में दूर तक नहीं जाते ... और साहित्यिक या बुद्धिजीवी ज्यादा आक्रामक लेखन पसन्द नहीं करते... मध्यम मार्ग मुझे अभी तक नहीं मिला है।... आप सब मार्गदर्शन करें ....

प्रदीप मिश्रा:-
भाई अवतार सिंह पाश ने लिखा है बीच का रास्ता नहीं होता। दूसरी बात यह की टर्म की मीनिंग भी समझें। हिन्दू, हिंदुत्व, सत्ता, ब्राह्मणवाद सब एक ही नहीं है।

मज़कूर आलम:-
भाषा अपनी जगह है, अंततः कारगर मुद्दे ही होते हैं। सड़कों पर आक्रामकता भी ज़रूरी है। लेख बेहतरीन है, इसमें कोई शक नहीं। dilute होने की ज़रूरत नहीं।
तर्क से ज्यादा सामाजिक स्थिति को ध्यान में रख कर आलेख लिखा जाना चाहिए। क्योंकि तर्क मनुष्यता के अंतिम सीढ़ी पर काम करते हैं।

आशीष मेहता:-
पिछले दिनों प्रदीपजी ने थोड़ी तल्खी में 'चंदन तिलक' एवं 50 देशों के वैज्ञानिकों से जुड़े' होने की बात कही थी। व्यक्तिगत तौर पर मेरे लिए यह तथ्य (अनेकानेक सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के व्यक्तियों से व्यवहार) बहुत 'मूल्य' रखता है। उनके तर्क/ विचारों से 'आज के आलेख' पर विमर्श की उम्मीद बनती है।

'गाय और जात' दोनों पर ही मेरी पकड़ नहीं है, पर 'गुजरात घटना' का पिछले दिनों आए पी. मुरुगन मुकदमे के निर्णय में उल्लेखित भीड़ के आतंक से खासा साम्य है । भीड़ में भय है (या राम में भय है) को खासा टटोला है, इस निर्णय में। 'सामुहिकता के आतंक' के कई उदाहरण हैं, देश में और बाहर भी।

'मुरुगनजी' को तो जीने का आदेश मिल गया, बेचारे 'अखलाख भाई' तो अल्लाह मियाँ के घर से ही गोहत्या का मुकदमा लड़ेंगे। दलित आंदोलन से जरूर उम्मीद है कि अखलाख शायद बरी हों।

संजय भाई से सप्रेम संबोधित होते हुए, लगता  है आपको 'तीन' से विशेष लगाव है,  'आँचलिकता' से कही ज्यादा । चाहे यह उत्कृष्ट आत्मावलोकन है या कुछ और, आपसे 'सटीक' एवं जटिल सवालों को शाब्दिक रूप दिलवा ही देता है। पिछला 'आलेख' भी तीन 'पायों' पर था। 'तर्क', 'वितर्क' एवं 'कुतर्क' तीनों का ही भान एवं विवेकपूर्ण इस्तेमाल, पिछली बार की तरह इस आलेख में भी है।

प्रतिकार का हर दमन के सामने ऊँचा दर्जा है, होना चाहिए। जो उम्मीदें इस आंदोलन से लगी है, उस पर राम लला  के आशिर्वाद की तो आवश्यकता है नहीं। पर इस संदर्भ में 'हिन्दु धर्म है ही नहीं' / भारत में  इतिहास का चक्र धीरे....' में आक्रामकता से ज्यादा 'विषय से भटकाव' है।

संजय जोठे:-
आशीष जी बहुत शुक्रिया... असल में अभी भी दलित समुदाय के लिए रोचक और उत्प्रेरक भाषा की खोज मेरे जेहन में जारी है। कई बार सामूहिक आक्रोश को भाषा या शिल्प के स्वीकृत सौन्दर्यशस्त्र में उचित स्थान नहीं मिल पाता. और वैसे भी साहित्य से मेरा कोई नाता नहीं रहा है। अभी अभी पढ़ना शुरू किया है।
इतिहास के चक्र वाले मुद्दे पर मेरा निवेदन है कि दलित आंदोलनों की इतिहास में अनुपस्थिति हिन्दू ब्राह्मणी धर्म की सफलता का प्रमाण है। वास्तविक इतिहास को मिटाकर मिथक पेश करना और समाज के मनोविज्ञान को तर्क और न्याय बोध सहित नैतिकता बोध से भी दूर रखना हिन्दू धर्म की सबसे बड़ी कुशलता रही है। इसी ने हजारों साल तक आक्रोश को पैदा ही नहीं होने दिया। इस तर्क को मैं खींचना चाहता था लेकिन चूँकि इसमें शब्द सीमा भी थी इसलिए नहीं कर पाया।
दलित विमर्श की दृष्टि से कुछ मौलिक मान्यताओं की बात करें तो इस तर्क को सबसे महत्वपूर्ण मानना होगा।

प्रदीप मिश्रा:-
आशीष जी आपकी टिप्पणी आलेख से ज्यादा महत्वपूर्ण है। दरअसल हम वर्तमान समय के मूल्यों को देखने और समझने की दृष्टी नहीं अर्जित कर पा रहे हैं। हमारी स्थिति कोल्हू के बैल जैसे कुछ पुरानी मान्यताएं और हाशिये पर पड़े मूल्य हैं। जिन पर लाठी पीटते रहते हैं। हिन्दू धर्म नहीं और ब्राह्मणवाद क्या होता है मेरी समझ में कभी भी नहीं आया। इसतरह के लेखों को पढ़ पढ़ कर ऊब गया हूँ। मैं कुछ कहता हूँ तो मुझे ब्राह्मण के चश्मे से लोग देखने लगते हैं। मैं क्या हूँ वह मेरे मित्र जानते हैं। मेरी रचनाओं में दिखाई देता है। मैं इस जाती और वर्ग की समस्या से बड़ी समस्याओं को सर उठाते हुए देख रहा हूँ। जिनपर लोग बात करने को तैयार नहीं हैं। खैर तकनीक विज्ञान सत्ता और बाजार के नए समीकरण को समझने का कोई सिलसिला तो निकलेगा ही। कभी न कभी तो हम इस जटिलता को समझ ही जायेंगे।

दीपक मिश्रा:-
संजय झोटे जी का आलेख सत्य का गहन साक्षात्कार है। बेहद तार्किक और समुचित ढंग से उन्होंने अपनी बात रखी है। यह वाकई इतनी बड़ी विडंबना है कि हमे तकनीक के इस दौर में भी जब इतिहास का अंत हो चूका है, दलित विमर्श पर इतनी कैफियत देना पड़ती है।

प्रदीप मिश्रा:-
संजय भाई आप सही कह रहे हैं। मैं कोशिश करूंगा। उदहारण के अब मेरे हिसाब से अध्ययन और विमर्श का विषय यह होना चाहिए की मस्तिस्क की कार्य प्रणाली और उसपर इलेक्ट्रोमैग्नेटिक तरंगों का प्रभाव। हम आप जिस असहिष्णुता और क्रूरता की बात करते हैं। इसका बहुत गहरा संबंध है। यह धीरे धीरे आपके डीएनए में बड़ा परिवर्तन कराने वाला है। अगर आप मोबाइल के युग के पहले और बाद के मनुष्य का अध्ययन करें। आपके कंप्यूटर के पहले और बाद के मनुष्य की बात करे। तो पाएंगे कि यह जो गुजरात में घटित हुआ है। या पूरे विश्व में घटित हो रहा है। अमेरिका में आये दिन बच्चे गोली चला देते हैं। यानी इमेजिनेशन का एक्सट्रीम पर पहुँच जाना और हमारी मनः स्थिति का अस्थिर हो जाना। सामान्य सी बात पर विचलन और इतना ज्यादा की नियंत्रण से बाहर। किसी भी तरह के अनुशासन का अतिक्रमण। यह तो एक पक्ष है जो तकनीक से आ रहा है। दूसरा पक्ष है विज्ञानं का जो वस्तुतः सृजनात्मक था। समाज के उत्थान और विभ्रम को हटाने का कार्य कर रहा था। पूंजी ने बहुत बड़ा पोटेंशियल देखा और सेंध फोड़ दी। आज जो शोध हो रहे हैं। वे पूंजी के दम पर और बाजार की दिशा में हो रहे हैं। जहां बहुत बड़े लैब और अधोसंरचनाओं को खड़ा कर दिया गया है। जिसमें नैसर्गिक शोध की प्रवृत्ती को या यांत्रिक में बदल जा रहा है। जबकि इतिहास गवाह है मनुष्य को भ्रम के अंधकार से बाहर लानेवाले सारे अविष्कार घरेलु प्रयोगशालाओं में हुए हैं। एक सेब के गिरने से जिस गुरुत्व कर्षण बल की खोज हो गयी थी। उस प्राविधी का गला घोंट दिया गया। क्योंकि उससे बाजार को कोई फायदा नहीं था। आज की सत्ता की धीरे धीरे टेक्निकल डोमेन की गुलाम बन रही है। जहां नियत्रण करनेवाला मानवीय मूल्य नहीं हैं। बल्कि लोहा है। सत्ताधारी चमक में अंधे हो रहे हैं। परिणाम स्वरुप मनुष्य और प्रकृति दोनों ही उनकी दृस्टि से ओझल हैं। संवेदना को कुंठित मारने में आज का तकनीकी हस्तक्षेप महती भूमिका निभा रहा है।  आज जिस तरह का समाज निर्मित हो रहा है। वह एक रोबोटिक समाज की तरफ जा रहा है। जिसमें जीवन की सुंदरता नस्ट हो जायेगी। सबसे मजेदार बात यह है कि इनमें धर्म, जाति और पुरानी समस्याएं बड़ी सहजता से घुल कर एक vartual जीवन चरित्र रच रहे हैं। भाई विषय जटिल है। मैं उतना सक्षम भी नहीं हूँ। लेकिन आज की साड़ी समस्याओं की जड़ें मुझे वहीं दिखाई देतीं हैं। इस सन्दर्भ में एक बड़ा विमर्श खड़ा हो तभी बात बनेगी।

आशीष मेहता:-
मेरी पोस्ट को संजय भाई एवं प्रदीपजी ने अपनाया, दोनों का ही आभार।

संजय भाई, आपकी तरह ही मैं भी साहित्यिक सृजक नहीं, बल्कि मेरी तो पढ़ाई भी शुरु नही हुई है। मेरी सीमित समझ में अकादमिक परिभाषाओं की अपनी सीमाएं होती हैं, ठीक उसी तरह जैसे 'वैज्ञानिक अवधारणाओं' की होती है। बढ़ती जानकारी /शोध इन्हें पुष्ट एवं बेहतर बनाते हैं। 'ब्राह्मणवाद' और 'दलित दमन' दो अलग मुद्दे हैं।  'ब्राह्मणवाद' किसे कहते हैं/ यह क्या है मुझे नहीं पता/ समझता, पर दलित दमन के ज्वलंत उदाहरण दिखते है, जैसे , तथाकथित छोटी जाति के IAS/सिविल सर्वेंट का रोना/ परेशान होना। जाति के आधार पर मंदिर में प्रवेश न देना (हालांकि, इस आधार मैं/आप भी दलित ही ठहरे, कईयों में से एक कारण कि हम दोनों ही "हज नहीं जा सकते"।)......सरकारी नौकरियों में भर्ती में नीतिगत आरक्षण है, पर निजी नौकरी में देखें, अप्रतिम भेदभाव नुमाया है। दक्षिण भारत को 'योरप' कहा जाता है, इसी संदर्भ में।

सिखों की लूटपाट (१९८४), बाबरी, गोधरा, बाबरी, (एक और बंगाली कस्बे का नाम भूल रहा हूँ) ..... यह अराजकता है, असामाजिकता है, असहिष्णुता है. ..क्या फिलवक्त गुजरात वाक्या, इसी की कड़ी नहीं है? क्या पेरुमल का मसला कुछ अलग है ??

जहाँ ब्राह्मण नहीं है, वहाँ भी दलित 'दलित' है, यह जानने/समझने के लिए भला किस 'पढ़ाई' की दरकार है ? कोई दलने वाला है, कोई दला जा रहा है। इसी पंक्ति के आसपास ही 'मार्क्सवाद' की प्रासंगिकता देख पाता हूँ ( नजर, मेरी कमजोर है, मार्क्स का कोई दोष नहीं है इसमें।)

इसी बिन्दु पर प्रदीप भाई के अंदेशों / आशंकाओं पर गंभीरता की पृष्टभूमि बनती है। प्रथम-दृष्ट्या, यह मनन 'आपके मुद्दे' से भटकाव प्रतीत हो सकता है, पर यह 'दलित मुद्दे' का विस्तार ही है, हाँ सामने ब्राह्मण नही है, भेद भी जाति का उतना नही है, जितना "पैसे और जानकारी" का है। आज एक शरीर एक हाथ से 'बिमारी' बना रहा है, और दूसरे हाथ से 'इलाज', और दोनों को ही 'खूब' बेच रहा है। यह 'बाजारवाद प्लस' है या कुछ और ......

पर खैर, यह आज का विषय नहीं है, सो.....मंच आपका है।

(Pradeepji, unless you're busy interacting cross-border, solicit your insights .....)

संजय जोठे:-
प्रदीप सर बहुत शुक्रिया आपका... निश्चित ही यह नए युग की नयी समस्या है जो पुरानी बीमारियों से मिलकर एक नया सिंड्रोम रच रही है। मुझे लगता है पुरानी बीमारियों के इलाज की प्रिस्कृ
सर मुझे लगता है कि एक नयी और जटिल बिमारी के सामने आ जाने से पुरानी और सरल बीमारी का खतरा कम नहीं हो जाता... खासकर तब जबकि उसने 90 प्रतिशत को बीमार बना रखा हो।

प्रदीप मिश्रा:-
मुझे कभी समय मिला तो गुजरात जैसी समस्या का विवेचन करने कोशिश करूंगा। मुझे तो यह वहाँ न दलित दिखाई दे रहे हैं। और न ही सवर्ण। ये दोनों ही use हो रहे हैं। खेल सत्ता का है। वह सत्ता जिसका कोई धर्म और जाति या मनुष्यता नहीं है। वह उस तकनीक की गुलाम है। जो बाजार से जन्म लेती है।

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