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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

भागचंद गुर्जर की कहानी "ऊपरी हवा"

सुभोर साथियो,

साथियो आज आपके लिए प्रस्तुत है भागचंद गुर्जर जी की कहानी ऊपरी हवा ।

कहानी पढ़कर अपने निष्पक्ष विचार जरूर रखें ।

कहानी

ऊपरी हवा

अजब घटना घट रही थी। चूँकि जहाँ घटना घट रही थी, वह कमरा मेरे कमरे के सामने ही पड़ता है इसलिए मैं भी सब स्पष्ट देख रहा था।
यह एक दो मंजिला मकान है जिसमें बीच में चौक है तथा चारों और कमरे बने हुए है। सभी कमरों में किरायेदार रहते है। मैं भी किराये से यहीं एक कमरे में रहता हूँ। मेरे सामने वाले कमरे में दीनदयाल अपनी पत्नी सुमन के साथ रहता है। अक्सर इस कमरे से मुझे सुमन के रोने-चीखने के स्वर सुनाई पड़ते है। कभी-कभी तो शराबी दीनदयाल सुमन को शराब के नशे में पीटता हुआ कमरे से बाहर भी घसीट लाता है।
पर आज तो बात ही निराली थी। वह मरियल सी सींकिया औरत अपने मुस्टंड पति को जो कुछ उसके हाथ में आ रहा था उसी से पीट रही थी। और शराबी दीनदयाल (उसका नशा तो कब का उतर चुका था) सकपकाया सा उसकी मार खाये जा रहा था। उसे कुछ सूझ नहीं रहा था। बल्कि वह तो उसके रोद्र रूप के आगे थर-थर कांप रहा था।
वह झाडू से दीनदयाल पर चोट कर रही थी और कह रही थी, ‘‘जलेबी ला.......... जलेबी खाऊँगी....... जा जल्दी लेकर आ.............. जलेबी खाऊँगी।’’
आस पड़ौस वाले भी इकट्ठा हो गये थे। तभी एक पड़ौसी बुजुर्ग महिला ने कहा, ‘‘इसमें कोई ऊपरी हवा का असर हुआ हैं यह जो मांग रही है वह लाकर दो। इसकी इच्छा पूरी करो।’’
दीनदयाल दौड़ा-दौड़ा गया और पास की हलवाई की दुकान से जलेबी खरीद कर लाया। जब वह जलेबी लेकर सुमन के सामने पहुँचा तो वह उन जलेबियों पर टूट पड़ी और बहुत ही बेतरतीब ढंग से उन्हें खाने लगी। फिर कुछ क्षणों बाद वह निढ़ाल सी होकर वहीं पर लेट गयी।
करीब पाँच-सात मिनट बाद वह उठी और बिल्कुल सामान्य सी स्थिति में आ गई। उसका वीर पति दीनदयाल अभी भी कुछ-कुछ डरा हुआ था। सुमन सभी आगन्तुकों को देखकर आश्चर्य से पूछने लगी, ‘‘क्या हुआ ? आप सब लोग यहाँ क्यों इकट्ठा है ?’’ पड़ौसी महिला ने कहा, ‘‘तेरे में कोई ऊपरी हवा का असर होने लगा है। वो बला तेरे शरीर में आने पर तू दीनदयाल को झाडू से पीट रहीं थी और जलेबी मांग रहीं थी। सुमन अपना माथा पीटते हुए बोली, ‘‘हे भगवान! ये सब तो हमारे उस गाँव वाले श्मशान के कारण ही हुआ है। उस दिन शाम को जब मैं गांव से लौट रही थी तब माँ ने मुझ समझाया भी था कि श्मशान के पास से मत जाना तूने खीर जलेबी खाई है। पर मैं तो भूल गई। वहीं से वह बला मेरे पीछे लगी है।’’
पड़ौसी महिला ने कहा, ‘‘हाँ थी तो वह कोई ऐसी ही बला’’।
सुमन ने कहा, ‘‘अब मैं क्या करूँ, चाची ? इसमें मेरा क्या दोष है ? कल ही मौसी के जाकर बूझा कराके आऊँगी। मौसी में माताजी की सवारी आती है। वही कुछ इलाज बतायेगी।’’
उधर उसके पति दीनदयाल का चेहरा उतरा हुआ था। वह अचम्भित था अपनी पत्नी का वह रूप देखकर। शायद सोच रहा होगा, ‘रोज उसके लात घँूसे और डंडे खाने वाली पत्नी में आज कहाँ से इतनी ताकत आ गई कि उसके सारे अंजर-पंजर ढीले कर दिये। जरूर वह किसी साये का ही असर है वरना उसकी पत्नी की क्या औकात। अब इसका तो इलाज करवाना ही होगा।’
पता नहीं सुमन अपने इलाज के लिए मौसी के पास गयी या नहीं। पर अब अमूमन दो-तीन दिन के अन्तराल में यह घटना घटने लगी। सुमन के हाथ में झाडू होती, वह तेजी से झाडू दीनदयाल पर चलाती और जलेबी की मांग करती। और इन दिनों वो पहले वाली घटना यानि दीनदयाल द्वारा सुमन को मारना-पीटना और गाली-गलौच करना बिल्कुल बंद सा हो गया।
फिर कुछ दिनों बाद सुमन द्वारा दीनदयाल को झाडू से पीटना और जलेबी मांगना भी बंद सा हो गया और सबसे अद्भुत परिवर्तन यह कि अब दीनदयाल शराब पीकर नहीं आता है। इस तरह घर का कायापलट मेरे लिए अचम्भे की बात थी।
मैं इन चीजों में बिल्कुल विश्वास नहीं करता। पर मुझे इस तरह सुमन की देह में प्रविष्ट हुई उस बला का काम ठीक लगा। अगर इसी तरह कुछ अन्य औरतों में भी ऐसी हवाओं का असर हो जाये तो कितने ही निठल्ले, निकम्मे और शराबी पति सीधे रास्ते पर आ जाये। मेरा जिज्ञासु मन घटना की गहराई में जाना चाहता था।
मैं सुमन से इस बारे में पूछना चाहता था, पर पूछ नहीं सका। फिर एक दिन जब मैं सुमन के कमरे के बाहर से गुजर रहा था तो मैंने पड़ौसी चाची और सुमन की बातचीत सुनी। मेरे कदम कुछ पलों के लिए वहीं ठिठक गये तथा मैं उनकी बातें सुनने लगा।
पड़ौसी चाची कह रही थी, ‘‘क्यों री सुमन! अब तो दीनदयाल बिल्कुल सुधर गया है।’’
सुमन ने कहा, ‘‘हाँ चाची! सब उस ऊपरी हवा का ही असर है। ये जब भी शराब पीकर आते तो वह बला अपना असर दिखाने लगती थी। फिर मौसी में जो माताजी की सवारी आती है उसने भी यही कहा था कि जब तक घर में दारू-पानी का सेवन रहेगा ये बला ऐसे ही तेरी देह में आती रहेगी। इनके भी बात समझ में आ गई और देखो जब से इन्होंने शराब छोड़ी उस बला ने भी मेरे शरीर में आना बंद कर दिया है।’’
तभी चाची बोली, ‘‘ज्यादा बने मत! तू तो दाई से भी पेट छुपाने लगी। मैं तो पहले दिन ही तेरा ड्रामा समझ गई थी।’’
सुमन ने कहा, ‘‘क्या करूँ चाची? तुम तो जानती हो इनकी शराब की लत को। तुमने भी तो कितनी बार समझाया था इनको। पर ये तो इन दिनों बहुत ज्यादा पीने लगे थे। दफ्तर से भी शिकायत आने लगी थी, ये वहाँ भी शराब पीये रहते थे। तभी मैंने यह तरीका अपनाया। पर चाची तुम्हे मेरी सौगन्ध तुम किसी से कहना मत। ये बात उन तक पहुँच गई तो गजब हो जायेगा।’’
चाची ने कहा, ‘‘ना बेटी मैं किसी से कुछ ना कहूँ। वैसे भी तूने तो कुछ किया ही नहीं जो कुछ किया उस ऊपरी हवा ने ही किया।’’
और फिर दोनों खिलखिलाकर हँसने लगी। मैं भी मुस्कुराते हुए अपने कमरे में आ गया।

भागचन्द गुर्जर
प्रस्तुति-बिजूका समूह
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प्रह्लाद श्रीमाली:-
भागचंद जी को बधाई शुभकामनायें धन्यवाद! शराबी पति के इलाज का देसी नुस्खा जबरदस्त है ।जो बराबर  आजमाया जा रहा है, विभिन्न  उद्देश्य और संदर्भ में ।कहानी की हकीकत मार्मिक है ।

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