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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

कहानी : पवन चौहान

साथियो आज आपके लिए प्रस्तुत है हमारे समूह के ही साथी पवन चौहान जी की कहानी अंतिम सांझ का दर्द ।

आप सभी की निष्पक्ष प्रतिक्रिया का इंतज़ार रहेगा ।

कहानी

अंतिम सांझ का दर्द

आज पिंकी को मरे पांच दिन हो चुके थे लेकिनअमित और सुमित अभी तक घर नहीं पहुंचे थे। खेत की मेढ़पर बैठा बसंतु बार-बार यह सोचकर दुखी हो जाता था किक्या उसके अपने बेटे भी इतने पत्थर दिल और स्वार्थी होसकते हैं? जिस मां ने उन्हें कभी भी जरा से दुख-तकलीफ तकका अहसास तक न होने दिया। जिनकी हर गलती के लिए वहलोगों के सामने झुकती रही। दोनों के लिए कभी उसकी ममतामें जरा भी कमी न आई। वही लड़के उसके बिमार होने पर तोक्या आए लेकिन उसकी अंतिम विदाई के वक्त भी उन्हें समयकी कमी खली।

                अमित ने तो टेलीफोन पर बिमार मां के पास नपहुंचने की अपनी मजबूरी बयान कर दी थी। उसे मां से ज्यादाइस वक्त कंपनी के फायदे के लिए विदेश यात्रा ज्यादा सहीलग रही थी। रही बात छोटे लड़के सुमित की। उसने भी साफकह दिया था ‘‘पिता जी मेरे पास छुट्टियां बिल्लकुल भी नहींहै। जो थोड़ी बहुत बची हैं उन्हें मैं दो महीने बाद बनने वालेअपने नए मकान के लिए खर्च करूंगा। मैं नहीं आ पाऊंगा। मांकी देखभाल के लिए गांव की किसी महिला को रख दो। यदिपैसे की कमी हो तो मांग लेना।’’

                नब्बे बीघा जमीन का मालिक बसंतु अपने दोनोंलड़कों की फितरत को जान चुका था। पिंकी अंतिम सांस तकअपने बेटे, बहुओं और पोते-पोतियों की एक झलक पाने केलिए तरसती रही। वह हर दिन निकलने वाले सूरज के साथएक आशा भरी निगाह बसंतु पर डालती और दोनों बेटों कीबातों को झूठलाते हुए कहती, ‘उनकी ये न आने की बातें सिर्फमुझे थोड़ा सताने के लिए हैं। मैं अपने अम्मू और सम्मू कोअच्छी तरह से जानती हूं। देखना, वे दोनों कल जरूर आएंगे।’’कहते कहते वह उनके बचपन में ही खोकर रह जाती औरबुदबुदाने लगती, ‘जब अम्मु-सम्मु मेरे पास थे तो घर में खूबसारी रौनक रहती थी। वे दोनों लड़ते-झगड़ते भी, खूब सारीजिद्द भी करते लेकिन रहते तो मेरे पास ही थे न, अम्मु-सम्मु केबापु।’ कहते कहते पिंकी की आंखें बहने लगती।

आंखें पोंछते-पोंछते वह अबकी बार चेहरे पर खुशी की चमकऔर आंखों में आंसुओं से उत्पन्न लालगी को जैसे छुपाते हुएकहती,‘याद है आपको अम्मु-सम्मु के बापु। जब पहली बारहम अपने नन्हे बच्चों को लेकर शहर आए थे और उस शहर केचैराहे पर पहली बार उन्होने गोल गप्पे और चाट खाई थी तोमेरे बच्चे कितने खुश हुए थे। कितना सुकून मिलता था इसतरह की खुशियां उनके चेहरों को देखकर।.............पर अबतो कई महीने बर्ष बीत गए मुझे मेरे बच्चों, मेरी बहुओं और मेरेपोते-पोतियों का चेहरा देखे बगैर। शहर ने मेरे बच्चों को जैसेअपनी गुलामी की जंजीरों में खूब कसकर जकड़ रखा है।’आंसुओं की अविरल धारा को बहने से रोकने की असफलकोशिश में लगी पिंकी अपनी बात को जारी रखते हुए फिरकहती है,‘हमने अपने बच्चों को पढ़ा-लिखा कर जैसे बहुतबड़ी गलती कर दी है। क्या इनकी किताबों में कहीं यह जराभी नहीं लिखा कि मां-बाप को उम्र के इस पड़ाव में अपनेबच्चों के स्नेह और प्यार की आवश्यकता होती है। क्या इसपढ़ाई-लिखाई से बच्चों की अपने मां-बाप के लिए संवेदनाएंसमाप्त होकर रह जाती हैं।’

हल्के से विराम के बाद वह फिर कहने लगती,‘काश, हमनेअपने बच्चों को अनपढ़ ही रहने दिया होता। कम से कम वेहमारी आंखों के सामने तो होते।’ पिंकी ऐसे ही रोज कुछ दिनोंसे बुदबुदाती रहती और बच्चों से जुड़ी हर बात जो उसे यादआ जाती कुर्सी पर बैठे-बैठे कहती जाती।

बसंतु पिंकी को हर तरह से दिलासा देता रहता। उसे खुशरखने की कोशिश करता। परंतु पिंकी ने तो बस अब अपनेबच्चों और उनके परिवार से मिलने की जिद पकड़ कर रखीथी।

वह कहती,‘अम्मु-सम्मु के बापु, हम कितने बदनसीब है न।हमारे पोते-पोतियों को गए हुए कितने बर्ष बीत गए लेकिनउन्हे हम मुश्किल से एक-दो दफा ही देख पाए। वो भी तब जबउनके मुंह में जुबान नहीं आई थी। मेरी तो उनसे बात करने कीहसरत ही रह जाएगी शायद। कितनी बदनसीब हूं मैं। हम तोमिलने भी नहीं जा सकते उनसे। काश, मेरी रीढ़ की हड्डी कायह रोग मुझे कुछ दिनों के लिए उनसे मिलने की इजाजत देपाता।’

‘कोई बात नहीं पिंकी तुम एक दिन जरुर स्वस्थ हो जाओगी।मेरे दोनों बच्चे तुम्हे शहर के अच्छे अस्पताल ले जाएंगे। वैसेभी हमारे शहर के सबसे अच्छे अस्पताल में तुम्हारा इलाजचल तो रहा है। देखना, कुछ ही दिनों में तुम स्वस्थ होकरदौड़ने भी लगोगी। फिर हम दोनों अपने बच्चों, पोते-पोतियोंऔर बहुओं से मिलने खूब भागते हुए जाएंगे। देखनातुम...........’ यह सब कहते-कहते बसंतु का गला भर आयाथा। वह पिंकी के सामने से उठा और यह कहता हुआ कमरे सेबाहर निकल आया, ‘बारिश आने वाली है। मैं बाहर सूखने रखेकपड़ों को उठा लाता हूं।’

कमरे से बाहर निकलते ही बसंतु खूब दहाड़े मार मारकररोया। वह भी तो अपने बच्चों से मिलना चाहता था। वह भीउन्हे जी भरकर देखना चाहता था। अपने पोते-पोतियों, बच्चोंसे मिलना चाहता था। वह हर त्यौहार में घर के सामने कीसड़क पर नजरें गड़ाए खड़ा रहता कि शायद इस वाली बस मेंउसके बच्चे उनके पास आएंगे। यह वाली नही ंतो अगलीवाली बस सही।......... लेकिन अंतिम बस तक जब कोई नहींआता तो वह भरी-भरी आंखे लिए पड़ोस के परिवार में आएउनके रिश्तेदारों के बच्चों को ही खूब सारी मिठाइयां बांटताऔर दो घड़ी उनके साथ बातें करके, उन्हे कहानियां सुनाकरअपने गम को हल्का करने की कोशिश करता।

वह उन बच्चों को पिंकी के पास भी ले जाता ताकि पिंकी कादिल बहल सके और उसे अपने पोते-पोतियों की कमी महसूसन होने पाए। पिंकी भी उन बच्चों को बहुत प्यार करती। उन्हेउनके पसंद की चीजें खिलाती और खूब सारी कहानियांसुनाती। उन्हे अपने दोनों बच्चों की बचपन की अठखेलियांबताती और उनके साथ खूब सारा हंसी-मजाक करती। वहबच्चों को बताती कि आपके जैसे उसके भी पोते-पोतियां हैं।आज वे शायद लेट हो गए हैं। लेकिन वे कल हमारे पास जरुरआएंगे। तब मैं तुम्हे उनसे मिलवाऊंगी।’ बच्चे मासूम निगाहोंसे बस पिंकी का चेहरा निहारते रहते।

बसंतु पिंकी से कहता कि वे दोनों बहुत अभागे हैं जो उन्हेंअपने लड़कों, बहुओं, पोते-पोतियों का सुख कभी प्राप्त नहींहुआ। पोते-पोतियों को अपनी गोद में खिलाने, उन्हें प्यारी-प्यारी सी बातें व कहानियां सुनाने के अरमान ही रह गए। तोपिंकी बसंतु को भावनात्मक सहारा देते हुए कहती, ‘‘तुम भीन, अम्मू-सम्मू के बापू। बेकार की बातें अपने दिमाग में लातेरहते हो। हमारे लड़कों की अपनी जिंदगी है। वे अपने पैरों परखड़े हैं और खुश हैं। हमें उनकी खुशी में ही अपनी खुशियों कोढूंढना है। गांव बुलाकर क्यों हम उनकी तरक्की में बाधाडालें।’’

‘तरक्की! कैसी तरक्की? ऐसी तरक्की किस काम की जोउनसे उनके मां-बाप तक को भूला दे। यह तरक्की का कौन-सारुप है भला?’ बसंतु के शब्दों में दुख और गुस्सा दोनों था।

‘इन बातों पर ज्यादा ध्यान नहीं देते। मां-बाप को बच्चों कीखुशी में ही अपनी खुशियां तलाशनी चाहिए। हमें उन पर अबबेड़ियां नहीं डालनी चाहिए। जब उनका मन होगा वे आजाएंगे............. हम अभागों से मिलने। अब हमारे पास बचा....

प्रस्तुति-बिजूका समूह
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टिप्पणियां:-

रेणुका:-
कहानी का दूसरा भाग भी है क्या? विषय बहुत आम है। रचना पढ़ने में ठीक ठीक लगी।

कमल टाटा:-
"अंतिम साँझ का दर्द"
अकेले माँ बाप की एकतरफा ऐसी इतिव्रित्तात्मक कथा है जिसे पढ़ना शुरू करते ही पाठक समझ जाते हैं। 
छुट्टी न होने की बात कहने वाला बेटा,  मकान बनाने के लिए भला छुट्टी बचा ले , लेकिन क्या वह बताएगा भी?
ऐसे संदर्भ कहानी को कमजोर बनाते हैं। 

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