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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

14 नवंबर, 2017

धनंजय शुक्ल की कविताएं


धनंजय शुक्ल: ज़रा अटपटे और अलहदा स्वभाव के धनी हैं। युवा है । पढ़ते ज्यादा है और लिखते कम है। साहित्यिक प्रकृति के ज़रा कम और वस्तुगत स्थिति के  पीछे देखने वाले विचार के रूप में कुछ ज्यादा है । ऊपर से देखने पर कभी-कभी निरपेक्ष  भी लग सकते हैं ।  धनंजय ज्यादा कला-संस्कृति की समझ रखते हैं, मगर ज्यादा प्रपंच में नहीं पड़ते हैं। जैसा देखते-समझते हैं। वैसा ही कह भी देते हैं। किसी ख़ास तरह के संबंध व विचार से अधिक लाग-लगाव नहीं रखते हैं। ऐसे पारदर्शी इंसान ज़रा कम होते हैं। जहां होते हैं, उनसे किसी की कम ही निभती है। हम इनके तौर-तरीकों और जीवन-व्यवहार पद्धतियों से असहमत भले हो सकते हैं , लेकिन इन्हें अस्वीकार नहीं कर सकते हैं। यह हमारे समय और समाज के ज़रूरी अंग हैं। सम्माननीय भी। हालांकि इस नौजवान ने बीटेक किया है। कुछ कालेजों में पढ़ाया भी है। और भी कुछ किसिम - किसिम की चाकरी की है। मगर कहीं रम नहीं सके। नदी की तरह बहने में जीवन का सार नज़र आया शायद, इसलिए समय-समय पर देशाटन पर निकल पड़ते हैं। एक काम है जो सदा करते हैं और वह है पढ़ना। अपनी वैचारिक -दार्शनिक अभिव्यक्ति भी दर्ज करते रहते हैं । आपकी कविताएं  कृतिओर , जनसंदेश टाइम्स आदि में छपी हैं । कहीं रचनाएं भेजने और सहेजने में रुचि नहीं है। कविता के इलाके में खासे अपरिचित भी है। परिचित और चर्चित होने की फिक्र भी नहीं है।  लिखने-पढ़ने के अलावा कोई काम-धंधा नहीं करते हैं। हमें साथी आशीष सिंह ने उनकी कविताएं भेजी है। हम बिजूका पर साझा भी कर रहे हैं।


कविताएं

1

शोक में डूबा हुआ शहर

एक मार्क्सवादी
पूर्णकालिक कार्यकर्ता
शहर के इतने बड़े दफ्तर में
तमाम किताबों के बीच
अकेला बैठा हुआ है
कोई नही है उसके पास
शोक में डूबा हुआ शहर
तमाम तरह के आंदोलनों के लिए तैयार है
जिसमें उसकी कोई भागेदारी नहीं है ।

एक प्रतिष्ठा प्राप्त लेखक
इतना कुछ लिख चुका है , लिख रहा है
उसके पास नही हैं पाठक , श्रोता
और उसकी अहमियत खत्म हो गयी है
अब उसकी अपनी ही नजरों में ।

शहर का सबसे दबंग सांसद
बंद कर दिया गया है जेल में
वैसे भी अब उसके चलाये कुछ चल नही रहा था
चीजें स्वचालित हो गयीं थी ।

एक अर्थशास्त्री जिसे कभी कोई नही जानता था
हर दफ्तर , दुकान और घर में जाकर
अर्थशास्त्र के सूत्र और सिद्धांत का
व्यावहारिक परीक्षण कर रहा है ।

तथाकथित भगवान या संत के पीछे
इतनी बड़ी भीड़ जो इकठ्ठा हो गयी थी
वह समझ गयी
कि वो आयोजकों
और कालाधन का उपयोग करने वालों का शिकार हो रही थी
लेकिन फिर भी उसके पास मनोरंजन के लिए
और कोई सस्ती जगह न होने के कारण
वहां से हट नही रही थी ।


K Thouki

फुटपाथ पर जितने लोग खाना बनाकर
वही सो जाने के लिए बाध्य थे
असल में वे कोई भूखे लोग नहीं थे
गाँव में उनके मोबाइल सेट का
रिचार्ज खत्म हो गया था
उसे भराने के लिए पैसा कमाना था
जो शहर में ही होता है
इसलिए वे फुटपाथ पर रहकर पैसा बचा रहे थे
ऐसा एक सिरफिरे के सर्वेक्षण में निकला ।

शहर में गाड़ियाँ और फ्लाईओवर बढ़ गये
इसका कारण
कुछ लोगों ने ये बताया
कि दुबई में
बुर्ज़ खलीफा जैसी इमारत बनानी थी
और विश्व बैंक के कर्मचारियों का
रोज़गार बचाए रखना था
जबकि यहाँ के लोगों को
इस रिश्तेदार से उस रिश्तेदार के
शादी ब्याह के अलावा
और कहीं जाना ही नही था ।

एक पत्रकार और एक साहूकार
अपने समाचार पत्र के लिए
मुख्य खबरों का चुनाव कर रहे थे
पत्रकार जो पुराना मार्क्सवादी था
और साहूकार उस ज़माने का
उसका सहयोगी
पत्रकार, जो साइकिल से सारे शहर में घूमता था
साहूकार,जो अपनी दुकान पर
बौद्धिक बहस के लिए
चाय का ठेका लगवाता था ।

वहां एक दुबला-पतला
पढ़ाकू सा आदमी आता था
जो अब विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर जैसा कुछ है
और दुनिया को उत्तर-आधुनिक
या नव-मार्क्सवादी बहसों का
कुछ अंश पढ़कर सुनाता है ।

वहां एक ठिगना सा
चुप-चुप रहने वाला लड़का आता था
जिसे कुछ लोग बहुत चालाक समझते थे
सुना है वह आईएस अधिकारी हो गया
और किसी गंवार टाइप
संस्कृति मंत्री का पी ए है ।

और हर बात में हकलाने वाला लड़का
जो उस ज़माने में
जब सूचना तन्त्र इतना फैला हुआ नही था
रहस्यमय रूप से
अपने पास
हर तरह की जानकारी रखता था
वह कई हिट फिल्मों का निर्देशक हो गया है ।

यह बड़ी अच्छी बात है
कि शहर के ज्यादातर लोग
अकेले में बात करते रहते हैं
लेकिन उन्हें कोई पागल नहीं कहता
सिर्फ कान में लीड दिखाई पड़ जानी चाहिए
जो दिख ही जाती है ।

घूँघट में रहने वाली औरतें
जाने कब
जीन्स पहनकर सड़क पर उतर आयी थी
कई स्मार्ट और निट्ठले टाइप के
अधिकारियों के लड़के
जिनकी गृहस्थी
अब इन्ही कामकाजी लड़कियों के बल पर चलनी थी , चल रही थी ।

काम करने वालों का महत्व खत्म हो गया था
पूंजीपतियों का पैसा
जो उन्होंने सरकारी कामों का ठेका
ले-लेकर कमाया था
एक योजनाबद्ध तरीके से
पहले विकसित करने
फिर एकत्र करने के खेल के रूप में रचा था
जिसमें हर एक व्यक्ति की
निश्चित आय थी
जहाँ पहुँचने के लिए एक निश्चित तरीका था
और वहां कब्जा कर लेने की एक होड़ थी
इस तरह से
काम करने की एक कार्पोरेट व्यवस्था थी
जो ऊपर से बहुत कुशल प्रबंधन का नमूना थी
लेकिन गहरे में
बहुत बड़ी आराजकता थी
जो उसको झेल जाता था
वो नायक था , नायिका थी
वर्ना बीमार था
जिसके उपचार के लिए
तमाम तरह के और उद्योग थे
जो बिलकुल प्रयोगशील थे
वैज्ञानिक अनुसन्धान करने वाले
मष्तिष्क की तरह उर्वर थे ।

एक कवि टाइप का आदमी
बड़ी देर से
कूड़ा बीनने वाली लड़की को देख रहा था
और सोच रहा था
यदि इस लड़की की देखभाल की जाये
तो यह भी
किसी फ़िल्मी हेरोइन से कम नहीं लगेगी
इसी बीच तमाम भीख मांगने वाले
छोटे- छोटे बच्चों का झुण्ड
उसके पास इकठ्ठा हो गया
वह यह सब देखकर दुःखी था
करुणा भाव से भरा हुआ,
अपने आप को बुद्ध समझने ही वाला था
कि बच्चों की चीख पुकार से झुंझलाकर
उन्हें बहुत तेज से डांट कर भगा दिया
उसने अपनी जेब में देखा
एक रूपये का सिक्का भी नहीं था
इस ज़माने में उसकी यह दुर्गति हो गयी थी ।

" पैसे हों तो मैं सारे दुनिया को चला सकती हूँ "
एक दसवीं क्लास की लड़की
अपनी तमाम सहेलियों को
बड़े आत्मविश्वास से बता रही थी,
टेम्पो वाला ड्राईवर उसे देख रहा था
और अपनी मुस्कराहट छुपा रहा था
एक ज़माने में
उसने अर्थशास्त्र से मास्टर डिग्री ली थी ।

एक चित्रकार
जो अपने शुरुवाती दौर में ही
क्लासिक चित्र बनाने की योग्यता से भरा था
अब कुछ व्यावसायिक पत्रिकाओं में
कार्टून बनाता है
और अपने बच्चों की फीस
जमा करने की चिंता में लगा रहता है
जिसे उसने कान्वेंट स्कूल में भर्ती कर दिया है,
वह इसे अपनी गलती भी कह सकता है
लेकिन अपने प्राइमरी पाठशाला में
पढ़ने के अनुभव से सीख लेते हुए
सही कहने के लिए बाध्य है
चुभती आँखों से हर दृश्य को देखते हुए
चुप ही रहता है ,
बड़ा शालीन है बेचारा !

शहर के कितने बड़े-बड़े सूरमा
आउटडेटिड हो गये
उन्हें पता ही नही चला
वे अपने समर्थकों के साथ
एक अलग दुनिया बनाने में
जिन्दगी के अंतिम दिनों तक
अपनी पूरी उर्जा खर्च करते रहे
उनकी आने वाली पीढ़ियाँ
उनके इस सनक का
खामियाजा भुगतने के लिए बाध्य थी
शहर के समझदार लोग
उनका भी शोक मना रहे थे
और उनकी लड़कियां
शादियाँ करके विदेश जा रही थी
या अपने मनपसंद के
वर को ढूँढने में लगी हुयी थी ।

प्रेम करने वाले लोग भी शहर में थे
मॉल में , पार्क में , कैफ़े में
और बाइक पर
फ़िलहाल तो प्रेम था ।
अंत में उनका क्या हुआ,
पता नही
उनके बारे में एक नौजवान दोस्त कह रहा था
जो शाम को बगैर दारू पिए रह ही नही सकता
और इस तरह चार - पांच बार प्रेम कर चुका था
कि लड़के नौकरी ढूँढने चले जाते हैं
और लड़कियां शादी करने
क्योंकि इतनी बड़ी जिन्दगी
और किसी तरह गुजर नही सकती ।

शहर में कुछ लोग कह रहे थे
ध्यान बहुत बड़ी कीमिया है
उसी से जिन्दगी का रूपांतरण हो सकता है
आत्म-ज्ञान ही सभी मर्ज़ की दवा है
और एकांत ही उसका रास्ता है
उन्होंने सारी सुविधाओं के साथ
शहर में अपनी एक रहस्यमय सी दिखने वाली उपस्थिति बना रखी थी
उनके सुख-दुःख
और अंत की कहानी
वे ही जानते थे
वे दुनिया में अपने मतलब की सारी चीजें लेकर दाता भाव से खड़े थे /हैं ।
००

         
K Thouki
                         

2

उसने बताया

उसने बताया

वह नहीं लिखना चाहता है किसी की कहानी

जबकि उसे पता है

कि उसे उसकी कहानी इस तरह पता है

जैसा कि वह जीने वाला भी नहीं जानता

और यह तो बिल्कुल ही नहीं जानता

कि वह जैसा जीता है

वैसा क्यों जीता है

और यह तो सोच भी नहीं सकता कि जैसा जीता है

उससे बाहर निकलकर जीने की भी

कोई संभावना

बिल्कुल उसके आस-पास ही मौजूद है

वह नहीं चाहता

कि तमाम दुखों को भोग रहे, लोगों के दुख को वो कहानी में फिर से भोगे

ऐसा नहीं कि वो उनके सुखों को नहीं जानता

जानता है तो भी वह उसे लिख नहीं सकता

वो बिल्कुल व्यैक्तिक होते हैं बल्कि दुख ही सामूहिक होते हैं उसने बताया

कि उसने देखा है

कि उनकी जिंदगी में छेड़छाड़ करने का मतलब

उन्हें और दुख के कुएं में ढकेल देना है

बड़ी मुश्किल से तो वे अपना जीवन बचाए रखने भर का सुख तलाश पाते हैं ।
००



3
                     

ऊपर कुछ गड़बड़ हुई होगी

उसने जबान इधर उधर की

और सेंसेक्स, निफ्टी, शेयर बाजार या ऐसे ही अड्डों पर मच गई हलचल

उसने एक बटन पर उंगली रखी

और गांव में कई किसान गिरे धड़ाम से

फैक्ट्रियों और दुकानों पर कुछ मजदूर डांटे और फटकारे गए

उन्होंने अंदाजा लगाया

ऊपर कुछ गड़बड़ हुई होगी

हर व्यवस्था में स्थापित लोग चौकन्ने दिखे

और अपने विश्वासपात्रों से कान में कुछ कहा सुना

मुस्कुराते हुए पाए गए, सब पर नजर रखे हुए लोग

भोला कवि तब भी अपनी या किसी दूसरे कवि की पंक्तियां गुनगुनाने में व्यस्त था

तब उसके लड़के-बहू या लड़की-दामाद में से

किसी ने बताया कि बाजार की हालत बहुत खराब है

और आप गुनगुना रहे हैं

तमाम संगठन अपने हितों को ध्यान में रखते हुए

चौराहों पर उतरने लगे

सभी अपना हित देख समझकर

कहीं न कहीं आश्रय ढूंढने निकल पड़े ।
००



           4

 इतिहास के कलपुर्जे

वे इतिहास के कलपुर्जे हैं

इतिहास द्वारा

शासित निर्देशित होते हैं

वे इस बात से खुश हैं

कि वे ऐतिहासिक परम्परा के वाहक हैं

वे प्रेरणा लेते हैं

ऐतिहासिक मील के पत्थरों से

वे अपने आपको प्रशिक्षित करते हैं

ऐतिहासिक मूल्यों पर परखकर

सम्भवता

वे इतिहास के निर्माता भी हों

हो सकता है

वे भविष्य में

अपनी ऐतिहासिक भूमिका को देख पाते हों

इसलिए तो

वे वर्तमान के क्षणों का उपयोग करते हैं

चारे की तरह

लेकिन

मैं जो ऐतिहासिक दायित्वों से

अपने आप को

मुक्त करने के लिए

प्रतिबद्ध हूँ

मैं ऐतिहासिक पात्रों से

अपना तादात्म्य होते हुए देखता हूँ

तो तुरंत सावधान हो जाता हूँ

मैं समस्त ऐतिहासिक मूल्यों का दबाव

अपने ऊपर महसूस करता हूँ

और उससे मुक्त होने की कोशिश भी।

कम से कम मैं

इतिहास का कलपुर्जा बनने के लिए तैयार नही

इसलिए

किसी भी सांगठनिक और वैचारिक मुहिम से

अपने आपको अलग करता हूँ ।
००

K Thouki

                   5

 सोचा तो मैंने भी


सोचा तो मैंने भी

जिंदगी की शक्लो सूरत

कुछ ठीक नही

आओ उसे

कुछ कायदे,करीने से सजायें

पर नही

जिंदगी

मेरी विरासत नही थी

और दुनिया

मेरी फटी कमीज नही थी

जिसे मैं सिलने की कोशिश करता

उसे किसी काबिल

रंगरेज से रंगाता

उसे रफू कराता

उसे धुल कर चमका देता

उसे प्रेस करता

और क्रीज बना देता

उसे अपने बने बनाये

स्वस्थ शरीर पर धारण करता

और उसकी शोभा बढ़ाता

चाहे अंततः

वो मेरी ही शोभा बढ़ाता

परन्तु नही

जिंदगी

मेरे कब्जे में आ जाने वाली

कोई चीज नही थी

जिसे उठाकर

इस या उस ताखे पर रख देता

और आने वाली पीढ़ियों को

सजे सजाये ड्राइंग रूम की तरह दिखाता

कि देखो

यह मेरे द्वारा बनायी गयी दुनिया है

मेरी तरह और भी लोग सोचते हैं

और इस दुनिया को बदलने की निष्फल कोशिश करते हैं ।
००


            6

सवाल यह है

सवाल यह है

कि हम जिस इतिहास बोध के साथ चीजों को देखते हैं

उसके निहितार्थ को समझते भी हैं

या पारम्परिक तौर पर उसमें शामिल हो जाते हैं

फर्क कोई नही है दोनों में

लेकिन इतना तो है

कि जब आप सचेत रूप से कहीं जाते हैं

तो वहां से लौट भी सकते हैं

नही तो वहां गुम होने की संभावना सबसे अधिक रहती है

फिलहाल जो जानते हैं

और पहल करते हैं

जिनकी जिम्मेदारी सबसे अधिक होती है

उनकी नीयत की तो पड़ताल होनी ही चाहिए

उनके अपने द्वारा भी

और उनका साथ देने वालों द्वारा भी

उनके विपक्ष में काम करने वाले लोग भी यह तो स्वभावता करते रहते हैं

फर्क समझ में आना चाहिए

सुहानुभूति रखने वालों की आलोचना को देखकर

कि वे कितना अलग हैं दुश्मनों से

दुश्मनी की बात आयी

तो देखना जरूरी है

कि वो व्यक्तिगत से शुरू होकर समष्टिगत तक गयी है

या समष्टि सचमुच आहत हो रहा था

और उसमें व्यक्तिगत योगदान दिया गया है

असल में डरे हुए लोग हर जगह हैं

वे अपने डर में कुछ भी कर सकते हैं

और किसी का भी कर सकते हैं उपयोग

अपना हित साधने में

हलांकि हित साधने का अवसर भी सबके पास होना ही चाहिए।
००

           7

काम जोखिम का नहीं है

काम जोखिम का नहीं है

लेकिन अपनी भूमिका को बढ़ाकर देखने से

कोई भी काम जोखिम भरा बन जाता है

हम छोटे अनुभवों से भी जानते हैं

अनुभवों के बढ़ते जाने से जिम्मेदारियां बढ़ती जाती हैं

अपने को बचाने

और दूसरों को सिखाने का जोखिम भरा काम

सिखाना भी हम पर आ पड़ता है

काम सिखाना कोई जोखिम भरा काम नही है

बल्कि उसका उससे संवाद महत्वपूर्ण हो जाता है

जिसमें सीखने वाला कुछ का कुछ और सीख जाता है

जबकि उसके दुष्परिणाम आने तक

धैर्यपूर्वक उसे देखते रहने

और उसके कामों की समीक्षा करते हुए

उसे फिर से सिखाने के लिए तैयार रहना पड़ता है

वे काम सचमुच बहुत जोखिम भरे हैं

जो नीतिगत हैं

उसके परिणाम को बहुतों को भुगतना पड़ता है

जबकि तकनीकी कामों में सहूलियत रहती है

कि गलत दिशा में जाने पर

वह खुद ही सहयोग नही करता

और पुनर्विचार के लिए विवश कर देता है !
००

अवधेश वाजपेई

            8

उनकी जिंदगी व्यर्थ जा रही थी

क्योंकि

उनकी जिंदगी व्यर्थ जा रही थी

उन्होंने उसे अर्थ देने की कोशिश की

उन्होंने अतीत से

बहुत सुंदर-सुंदर चीजें ढूंढ निकाली

उन्होंने वर्तमान में

उसे प्रयोग लाने लायक

रूप और रंग दिया

वे सोचते थे

कि जिंदगी इस तरह

मूल्यवान हो सकती है

उन्होंने लोगों का आह्वान किया

परन्तु लोग उतने सक्षम न थे

जितनी कुशलता से

उन्हें इसे सीखना था

इसका उपयोग करना था

फिर क्या?

उनके भविष्य को साफ-साफ दिखाना था

जो बड़ा धुंधला था

लोगों ने यही किया

जिन्हें लगता था

कि जीवन का जीने के अतिरिक्त

कुछ और मूल्य भी है

लोग उनके पीछे खड़े होते गये

उनसे सीखते गए

और अंत में

इस बात के लिए सहमत हो गए

कि भविष्य को संवारने के लिए

वर्तमान की बलि चढ़ानी आवश्यक है

अतीत द्वारा एकत्रित की गई

कुछ पूंजी का त्याग करना आवश्यक है

यहां तक

कि अपने स्वस्थ शरीर

समृद्धि मन

और अनुकूलित परिस्थितियों का भी।
००

   
संपर्क:
               
धनंजय शुक्ल

2/318, वास्तु खंड गोमती नगर

mo  - 09415964108

         

4 टिप्‍पणियां:

  1. एक से बढ़कर एक
    सभी कविताएं सुपर्ब

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  2. एक से बढ़कर एक
    सभी कविताएं सुपर्ब

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  3. दृष्टिसम्पन्न प्रौढ़ कविताएं। इतना आसान भी नहीं इन्हें पढ़ना। कि कविता महज़ शब्दों की बाजीगरी तो है नहीं। यह जीवन और जगत को जो कवि ने देखा उसका आख्यान है उस जगह के आसपास जाना होगा तभी देख सकेंगे ठीक वही जो कवि ने देखा और कहा।

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  4. इन कविताओं को महसूस करके पढ़ा जाए,तभी इसकी सार्थकता को समझा जा सकता है। दर्शन का प्रभाव स्पष्ट झलकता है,तो इसे पढ़ने और समझने के लिए थोड़े वज़नी सोच की नितांत आवश्यकता है। अच्छा या बुरा कुछ भी नही,पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर पढ़ने पर यह कविताएं, उस जीवन की भांति लगती हैं, जिसका कोई उद्देश्य नही। जरूरी नही की हर कार्य का कोई उद्देश्य निश्चित हो।

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