image

सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

13 सितंबर, 2018

जया घिल्डियाल की कविताएँ



जया घिल्डियाल



 घस्यारियाँ

गाँव में तब,
राशि के पत्थर,
अंगूठियों में नहीं ,
आँखों  में  होते थे जड़े |

घर लौटती घस्यारियों* की,
ठुड्डी तक झूलती लटें,
पूले से निकलते ,
तेज- धार घास के पत्ते,
नाग सरीखे ,
पहरा देते,
आँखों में जड़े ,
इन  रत्नों पर |

दोनों  हाथों से सर पर पूला* पकड़े घस्यारियाँ ,
कोई लोकधुन गुनगुनाती ,
इन सर्प से मुड़ते रास्तों  पर चलती |
उनके कटिप्रदेश को,
पहाड़ों  को काटती भिलंगना-मंदाकिनी ने ,
दिये हैं कटाव |

आधी दोपहरी ,
कानों से गर्दन तक चंपई रंगत फैला ,   
जब थोड़ा और नीचे सरकती ,
तो खिल उठते
उन देहों में कितने ही बुरांश !

पैरों  में पिंडर-नयार बाँध ,
वो पार कर रहीं होतीं,
खेत और जंगल |

सम्मोहन  में  बँधी आछरियां* ,
उतरती आसमान  से ,
झरते बुरांश ....
करते रंगमंच तैयार ,
चौफालों* के लिए |

फैलने लगती वनाग
आँखों  में दहक रहे रत्नों  से |
ब्रह्म गिरि से शिवालिक तक ,
समूचा प्रदेश होता सम्मोहन  में |

उठती गाँव  भर में  हिलोरें
पश्चिम से उठता तूफान भी ,
घस्यारियों की दया पर होता 
कि कब वो तूफ़ानों को भी चौफाला लगाने दें
या कि
गुज़र जाने दें  !


[ घस्यारी- घास काटने वाली स्त्री , पूला – घास का गट्ठर , चौफला – उत्तराखंड ,गढ़वाल में स्त्री – पुरुषों द्वारा एक साथ अलग –अलग टोली बनाकर किए जाने वाला श्रृंगार भाव प्रधान नृत्य , आछरियां – परियां ]






 चार सींगों वाला मेढ़ा

पहाड़ी की शक्ल में गड़ा है ,
शिव त्रिशूल
अंतिम छोर पर है इसके,
नन्दा भवन
बहती हैं यहाँ से ,
गौरी, पिंडर, धौली नदियाँ
पूजा-अर्चना करते यहाँ ,
किन्नर , यक्ष
अर्चना से पहले ,
हो जाते उन्मादित
जब देखते ,
दौड़ा चला आ रहा  चार सींगों वाला मेढ़ा |

जय-जयकार होती जाती
तीव्र
हिम-शिखरों को नहलाती
स्वर-लहरियाँ
त्रिशूल पर्वत को पहनातीं
हार |

अब मेढ़े का सिर
वापस घाटी की ओर लुढ़कता
जा गिरता
हंस कुण्ड में |

देवी प्रसन्न है , पर्वत पर
मनुष्य प्रसन्न है,  घाटी में
यह सोचकर
कि देवी नन्दा बढ़ा देंगी वन- सम्पदा इस वर्ष
जंगल भी रहेगा सुरक्षित
माँ पार्वती की सखियाँ
रखेंगी पहरा हर असुर पर !

नन्दा भवन में
माँ बना रही बाणक
बारह साल बाद
फिर चार सींग वाले मेढ़े के पैदा होने के ...

जतन चल रहे
यक्ष गंधर्वों के पाने को इसका रहस्य  !

सदियों पुरानी दंत कथा पाती है अपना वर्तमान , अपने ऐतिहासिक वृत्तांत के साथ  !
( सन्दर्भ साभार – गढ़वाल का इतिहास – पं हरी कृष्ण रतूड़ी )





स्वेटर बुनता नेपाली

कातिक -मंगसिर आ गए हैं
छज्जे पर  बैठी बड्डी
बुन रही है नातिन की स्वेटर ।

भेड़ें चराता नेपाली
आँगन के कोने सुस्ताने बैठता है
झोले से निकालकर सलाईयाँ और ऊन
बुनने लगता है स्वेटर
गाता है एक नेपाली गीत
बड्डी और उसकी उँगलियाँ
इस गीत की लय पर चल रही हैं
स्वेटर का पल्ला बढ़ता जा रहा है
मंगसिर -पौष और भी पास सरक रहे हैं |

नेपाली जल्द ही जायेगा नेपाल
और ले आयेगा अपनी दुल्हन को साथ |

छोटी बड्डी का पूरा घर खाली है
वो करेगा वहाँ रखवाली
जोतेगा उनके खेत
पालेगा भेड़ -बकरियाँ
और पैदा करेगा  चार -पाँच बच्चे |

वो जब भी देखता है स्वेटर बुनते हुए ये सपने
सरासर बढ़ने लगता है उसकी स्वेटर का पल्ला
और छज्जा लाँघ कर आ जाता है पौष और भी पास ...






लल्ली

गाँव वाले घर के
चार खेत ऊपर
कुछ मुश्किल मोडों के बाद
एक घर था
यूरोपियन नक्काशी की तर्ज़ पर बना
स्याह और सफ़ेद चिकने पत्थरों की गली उस तक जाती थी
वो घर घिरा था सेब, आडू ,खुबानी , पोलम के पेडों से |
आगे दूर तक फैले खेतों में
सफेद रोयेंदार कुछ अनोखे पौधे लहराते
और देते पूरे वातावरण को परी-देश होने का भ्रम ।

वहाँ रहती ,
एक देवदूत से चेहरे वाली लड़की
लल्ली !

जिसकी माँ थी एक नाटी ,कुरूप कुब्जा
तोतला कर बोलने वाली  स्त्री !

लल्ली का दुधिया रंग
पहाड़ी सेब से गाल
और नील आँखें जाने कहाँ से आईं थीं !
शायद पिता से !
जो इस दुनिया में नहीं थे
ना ही थी उनकी कोई तस्वीर |

लल्ली के घर हमेशा रहता
सबसे ज्यादा मक्खन , हरे सेब , हरे प्याज..
उसके कपड़े होते चटख़ रंगों के , साफ -सुथरे
जिनमें लगे होते सफेद लेस ..मोतियों के बटन...

वो कम ही बोलती :
' सेब खाओगे ?
चलो प्याज उखाड़े खेत से ?..
अपने भाई से कहो , बछड़ों को ना छेडें ...'
बस यही कुछ बातें ..

वो कभी पुष्टि नहीं करती :
- बाघ के घात लगाए बैठे रहने की
-  या नागराज मंदिर के रस्ते ,रात घोड़े पर घूमते भूत की |

घर लौटते चरवाहों और घस्यारियों से
वो सुनती अछरियों के किस्से बड़े गौर से
और बदल जाती उसके चेहरे की रंगत !

लोग कहते :
लल्ली को मना है लाल रंग पहना !




 बाघ और गुरोव

दीवाली  आती
शहर में बसे बेटे–बहू , नाती –पोते
लौट आते कुछ दिनों को गाँव
भरे होते आँगन , छज्जे,, तिबारियाँ |

शाम होते ही दादी सुनाती बाघ के किस्से :
“ पके गेहूँ  सी खुशबु  होती है बाघ की “

शाम को आस –पास की झाड़ियों  में पाखाना जाते
शहरी बच्चों के प्राण ,
बस हलक पर अटके होते 
झड़-झड़  हिलती झाड़ियाँ
और आधे में  भाग लेते बच्चे
पर बाघ कभी नुकसान नहीं करता |

कभी-कभार सुनने में आता
बाघ हरिजन बस्ती से उठा ले गया किसी की बकरी
कभी ग्राम प्रधान का कुत्ता ..

दादी फिर आगे बताती :
 “ दुछत्ती पर तेज़ से मत कूदना
पिछली सर्दी भर वहाँ रहा था गुरोव
सरसराता कभी आ जाता रसोई में
मैं डंडे से सरका देती उसे
वो चुपचाप मुड़ी –तुड़ी मरता  ,चला जाता
लेकिन ,तुम्हे नहीं पहचानता न ! “
   

आधे -पाखाने , गुरोव की छिड़-छिड़ाहट और बाघ के किस्से लिए
वापस शहर लौट आते बच्चे , बेटे , बहुएँ .

फिर खाली हो जाते  घर ,बगीचे, झाड़-झंकाड़ , दुछत्तियां
बाघों और गुरोव  के लिए |

( *गुरोव – पाइथन)








 कोठड़ा धारा

एकांत में घटित हुआ
कुदरत का इक नायाब किस्सा
कोठडा धारा !
सघन वृक्षों से अटा
पानी का सोता |

सीला , गीला
चारों तरफ से शैवालों से घिरा क्षेत्र
नमी से काली पड़ीं
शीशे सी दमकती चट्टानें ।

बीते ज़माने वहाँ था
इक  लैम्पपोस्ट .

संध्या अलाव जलाती औरतें
सूती धोती लपेटे शरीर पर
सर पर पल्ला डाले और इक छोर दाँतों से दबाए
“जय गौरा माँ " जपते
सीली-ठंड में कंपकंपाती आतीं |

कुछ देर बाद गुज़रते वहाँ से
कुछ शराबी , कुछ कामगार , कुछ दूसरे गाँव जाते लोग
रिक्ख के किस्से सुनाते
उससे बचने के नियम बताते :
"हे ! रे! तू नीचे दौड़ना रिक्ख दिखेगा जब
उसके बाल  आँखों में पड़ जाते हैं
तब वो देख नहीं पाता ....”

दिप- दिप जलते और धीरे-धीरे सीलते
कितने  ही किस्सों की  लकीरें पड़ी हैं
इन काली ,चमकती चट्टानों पर |

सुबह गंगाजी जाती औरतें और साँझ पानी भरती युवतियों की स्वरलहरियां
अभी भी सर्पाकार रेंगती हैं
लैंप-पोस्ट की काली नक्काशीदार लकड़ी ऊपर  |

( *रिक्ख – भालू )

जया घिल्डियाल की कुछ और कविताएं नीचे लिंक पर पढ़िए

https://bizooka2009.blogspot.com/2018/03/blog-post_76.html?m=1


जया घिल्डियाल
मूल निवासी – श्रीनगर गढ़वाल , उत्तराखंड
हाल निवास – पुणे , महाराष्ट्र
शिक्षा - स्नातकोत्तर (कार्बनिक रसायन विज्ञान )
रसायन विज्ञान अध्यापिका
पुणे , महाराष्ट्र

9922802301
jayayashdeep2000@gmail.com

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें