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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

06 सितंबर, 2018

 कहानी:

प्रेतात्मा की गवाही

 बद्री सिंह भाटिया

तीन दोस्त पहले की तरह दुकान के बरामदे में बैठे थे। शाम का समय। बाहर रिमझिम से भी कम वर्षा हो रही थी। महीन इतनी कि तभी पता चले कि जब चेहरा भीग जाए या नंगी बाजुओं के रोयों की जड़ो में पानी के कण एकत्र हो जायें। राख सी। वातावरण हरियाली से भरा। बादल गाँव में पसरे थे। जहाँ तक दृष्टि जाती उतना भी साफ नहीं दिखता। दूर पहाड़ों की चोटियाँ देखना तो असम्भव सा था। यह बरसात के अंत का समय था।

बद्री सिंह भाटिया


उन दोस्तों में एक बैंच पर, एक प्लास्टिक की कुर्सी पर तीसरा देर से आने के कारण स्टूल पर बैठा था। त्रिकोण सा बना। वहीं पास में गोईंठा सुलग रहा था ताकि उस समय ही उत्पन्न हुए मच्छरों के दल से बचा जा सके। फिर भी तीसरे ने वहीं पास से बणे की दो डालियाँ तोड़ डाली थीं और जिस्म के नंगे भागों में मच्छर न बैठने देने की नाकाम सी कोशिश में इधर-उधर हिलाने लग गया था। वे समसामयिक राजनीति पर बातें करने लगे थे। बीती रात और दिन में लंच के समय सुनी खबरों का आदान-प्रदान। यह प्रतिदिन का एक क्रम भी था। यूँ भी तीन जने बैठे हों और चुप, वह तो बात नहीं बनी। कुछ तो चाहिए बतियाने को। समय काटने को....। तभी एक दोस्त के मोबाइल पर एक सुप्रसिद्ध हिमाचली गाने की रिंगटोन बजी-तू मोही अच्छरिए, तू मोही बे....।  सुप्रसिद्ध गायक करनैल सिंह राणा के बोल। रणकती आवाज़। रिंगटोन आगे भी बजती कि तभी उसने हाथ में लिया लम्बी, बड़ी स्क्रीन के मोबाइल के शीशे पर उंगली मारी और कान से लगा लिया-दोनों दोस्तों ने चलती बात बीच में रोक दी। फोन सुनने में व्यवधान न हो। इसलिए... बात समाप्त। उसी दोस्त ने कहा-हाँ! हम क्या कह रहे थे। चर्चा गम्भीर थी मगर उसका इस तरह सामान्य, मामूली हो जाना कोई बड़ी बात नहीं मानी जाती थी। क्योंकि कई बार ऐसा हुआ है कि चर्चा चली ही कि कोई नया मिलने वाला आ गया, या दुकान में जल्दीवाला ग्राहक। उसे निपटाना पहले जरूरी हो जाता। यूँ होता यह भी है कि सामान्य सौदे वाला भी तीनों के बीच चलती चर्चा को सुनने बैठ जाता है या खड़ा रहता है। मन किया तो अपनी टिप्पणी भी दे देता है। मोबाइल हाथ में पकड़े जैसे ही उसने पूछा-एक दोस्त ने कहा, इस गाने की तो ऐसी-तैसी कर दी। लोग अपने-अपने तरीके से, नए अंतरे जोड़ गाने लगे हैं। तीसरे दुकानदार के दोस्त ने पूछ लिया-‘इसके पीछे की कहानी मालूम है?’
‘हाँ! एक मामूली से पढ़े पहाड़ी गायक ने यह उन्नीसवी शताब्दी में बनाया था। उसने ही इसे गाया भी खूब था।’
‘हाँ! तब.....।’
‘ये अच्छरी कौन थी?’ स्टूल पर बैठे दोस्त ने पूछा। इस पर दुकानदार ने लम्बी साँस ली। बोला, ‘उसके दादा ने सुनाई थी यह कहानी। बहुत पुरानी है। नाम ठीक से स्मरण नहीं है। पर अच्छरी नाम प्रचलित है, इसलिए कथा याद है। वे तो इस गीत को बाखूबी सुनते थे। रिकार्ड पर बजता तो सबको शान्त रहने को कहते।’ लाला, स्मृतियों में खो गया।

उस अग्रेज का नाम तो ठीक से स्मरण नहीं पर नाम के तौर पर तो यह मान लो कि उसका नाम राबर्ट था। राबर्ट डिसूजा। वे शिमला के नव-निर्माण के दिन थे। निर्माण कार्य कुछ कम्पनियों को दे रखा था। एक निर्माण कम्पनी ने अपने एक मैनेजर को हुक्म दिया कि शिमला नामक शहर में सड़कों और कोठियों का निर्माण हो रहा है। उनका काम देखने, प्रबन्ध आदि में तकनीकी सहायता देने उसे जाना होगा। ...और वह आया। कम्पनी ने या तत्कालीन व्यवस्था ने अपने कारिन्दों के लिए मकान, बंगले पहले बनवा लिए थे ताकि काम में कोई रुकावट न हो। उसे भी एक बंगला मिल गया था। कहते हैं कि वह बंगला काली बाड़ी के पास था कहीं। बंगले में रहने लगा तो सफाई के लिए, फूलों की देखभाल, दूध और रसोई बनाने के लिए आदमियों की जरुरत भी पड़ी। बंगला ऐसा कि अब कोई और अधिकारी भी आए तो वहाँ ठहर सकता था।








इन्हीं काम करने वाले आदमियों में अच्छरी की माँ भी थी गुलाबो। उसका पति दूध का काम करता था। गुलाबो कोठी में सुबह दूध भी लाती थी। साहब लोगों के सुबह शाम के काम भी करती। कब वह उस अंग्रेज के कहने पर रोटी भी बनाने लगी पता नहीं चला। इसी अंतरंगता में उसने अंग्रेज से अपनी बेटी को पढ़ाने का आग्रह कर लिया। वह चाहती थी कि उसकी बेटी भी गिटपिट सीख ले। अच्छरी की उम्र थोड़ा ज्यादा थी मगर कम्पनी के उच्चाधिकारी ने एक नए खुले स्कूल में उसका दाखिला भी करा दिया। वह पढ़ने लगी।
एक तो कम्पनी का उच्चाधिकारी दूसरे अंग्रेज बहादुर। स्थानीय लोग उनसे दबते थे। उस समय पहाड़ों में रजवाड़े थे जो कम्पनी से मिल गए थे। यत्र-तत्र कुछ मुगल भी थे। पहाड़ों के बीच कुछ गाँवों और वनों को हटाकर एक शहर का निर्माण हो रहा था। स्थानीय लोग राबर्ट डिसूजा को बाबू कहते थे। बाबू मायने बड़ा अफसर। बड़ा अफसर जिससे डरना चाहिए। जो किसी भी काम न करनेवाले को गुस्सा हो हंटर से मार दे।
गुलाबो और कम्पनी के बाबू की अंतरंगता बढ़ गई थी। गुलाबो लगती भारतीय थी मगर पहाड़ों के बीच उगा एक सफेद फूल भी थी। अंग्रेज का परिवार नीचे मैदानों में था-इसलिए उसकी भावना बढ़ी। उसने गुलाबो को अपने वश में कर लिया।
अच्छरी का दुर्भाग्य या समय का चक्कर। उसने एक दिन दोनों को कमरे में भिन्न परिस्थिति में देख लिया। वह पीछे हट गई। माँ ने अपने को संयत किया और अच्छरी को सम्भाला। वह इतना तो जानती थी कि यह गलत है। पिता के साथ धोखा है। मगर जब गुलाबो ने कहा कि यह उसने उसकी खातिर ही किया है। वह उसे पढ़ा रहा है। अंग्रेजी सिखा रहा है। कल कहीं अच्छा काम भी दिलवा देगा। किसी अंग्रेज से उसकी शादी होगी। उसके लिए यदि थोड़ा त्याग कर भी दिया तो क्या बुरा किया। वह प्रेम करने लगा है मुझसे। प्रतीक्षा में रहता है। उसका आग्रह नहीं टाल सकती। वह कम्पनी सरकार का आदमी भी है। और इस पर वह मेरी हर बात मानता है। तू जानती है ये सरकार......फिर यह हमें धन भी देने लगा है। सब नौकरों में मुझे सबसे ज्यादा माना जाता है।

अच्छरी न मानकर भी मान गई। चुप हो गई। उस दिन शाम को वह अंग्रेजी सीखने नहीं गई। अगले दिन गुलाबो ने उसे अंग्रेज को दूध ले जाने को भेजा। राबर्ट ने कहा भी था कि प्रातः उसे भेजा करना। वह भीतर आई तो अंग्रेज ने उसे आगोश में ले समझाया कि चलता है, बेबी। यह करना पड़ता है। तुम बुरा मत मानो। शाम के समय आ जाना। तुम्हें बड़ा बनाना है।

वह पाँचवी पास कर गई थी। उम्र ब्याह के योग्य हो गई थी। अब वह राबर्ट के साथ अंग्रेजी बोलती। रुक-रुक कर। अच्छरी की ग्रहण शक्ति ज्यादा थी। उम्र भी बड़ी थी। इसलिए वह जो सीखती, जल्दी स्मरण कर जाती।

शाम का समय था। गुलाबो काम कर रही थी। तभी उसे महसूस हुआ लड़की उल्टी कर रही है। उसका माथा ठनका। उसने कुछ नहीं कहा। अगले दिन वह डाक बंगले में उस समय गई जब अच्छरी वहाँ मौजूद थी। उसने भीतर देखा। वह सन्न रह गई। अरे! यह अंग्रेज माँ-बेटी दोनों के साथ....। वह पीछे हट गई। अंग्रेज से मुंह लड़ाना और टक्कर लेना उसे जंचा नहीं। उसने तरकीब सोची और अगले दिन अंग्रेज से जा भिड़ी-उसने उसे मजबूर किया कि वह अच्छरी से शादी कर ले। वर्ना। उसने हाथ में पकड़ा दरांत ऊपर उठा लिया मानों प्रहार करना चाहती हो। कि वह उसकी शिकायत वह बड़े अफसर से भी कर देगी। अंग्रेज डर सा गया कि शायद यह प्रहार करने वाली है। कि वह उच्चाधिकारियों को बता देगी तो बहुत अपमान होगा। नौकरी की शर्तां का उलंधन और परिवार में भी झगड़ा। डर और शक्ति से भीतर ही भीतर गुस्सा अंग्रेज ने विनम्रता और प्यार से उसके हाथ में पकड़ा दरान्त छुड़ा लिया। हंसा वह। बोला, ‘यदि वह ऐसे शादियाँ करता रहा तब तो जाने कितनी बीबियाँ हो जाएँगी। वह कहाँ से खिलाता रहेगा। इसलिए....। उसका तो यहाँ समय भी पूरा हो गया है। अच्छरी की माँ सन्न। यह क्या हो गया। बेटी! यदि....क्या होगा? वह विनम्र हो गई और अपनी बात पर फिर अड़ गई कि वह दोनों के साथ....यह नहीं चलेगा कि वह अच्छरी से शादी कर ले कि वह गर्भ से है। वह कभी हाँ करता कभी न। गुलाबों परेशान रहने लगी।  पर वह हठी थी और प्रतिदिन उस पर अपनी बात का जोर डालने लगी थी कि लड़की मुंह दिखाने काबिल नहीं रहेगी। और एक दिन बहस बढ़ी। वह साफ मुकर गया। तब गुलाबो ने उसका गला पकड़ लिया। छीना झपटी। मल्लयुद्ध की सी स्थिति। गुलाबो की पकड़ बढ़ती गई। वह छुड़ाने में असमर्थ। गुलाबों चीखने भी लगी। वह डर गया। कुछ न कर पाने और गला छुड़ाने की नाकाम कोशिश में उसने कमर में लटका पिस्तौल निकाला और  गुलाबो को गोली मार दी। ठाँय। कोठी का सन्नाटा भंग हुआ। गुलाबो की पकड़ी ढीली हुई और वह फर्श पर गिर गई। ठाँय सुन रसोई में काम करता खानसामा भीतर आया। डिसूजा ने उसे अपने काम में सम्मिलित कर ठण्डी पड़ी गुलाबो को गुसलखाने में घसीट लिया। कमरा साफ कर दिया।

होनी बुरी चीज होती है। सुबह की गई माँ जब वापस नहीं आई तो अपरान्ह में अच्छरी बंगले में आई। उसने माँ को ढूँढा पर जब वह नहीं मिली तो डिसूजा से पूछा। उसने कोई ठीक उत्तर  नहीं दिया। तभी अछरी को एक जगह खून के धब्बे दिखे। वह आक्रामक सी रसोई में गई। खानसामें को पूछा पर उसने भी कोई संतोषजनक उत्तर  नहीं दिया। तब उसे अहसास हुआ कि कुछ गड़बड़ है। वह डिसूजा से भिड़ पड़ी। मेरी माँ कहाँ है। सुबह यहाँ आई थी, लौटी नहीं। मैंने सुना यहाँ गोली चली है। उसने हाँफते हुए कहा। ‘नहीं।’ वह मुकर गया यहाँ तो आई ही नहीं। ‘पूछ लो खानसामा से। माली से भी। उसने सब बुलाये और पूछा क्यों भई आज गुलाबो यहाँ आई थी क्या?’ कोई नहीं बोला। वह दिनभर इधर-उधर भटकती रही। शाम को फिर आई। अंग्रेज उस समय शराब पी रहा था। उसे आया देख बोला, ‘आओ एक पैग पिओ अच्छरी। आओ इधर बैठो। मेरा मन आज उदास भी है, आओ बैठो इधर...’ मगर उसने अपना प्रश्न दागा, ‘वह नीचे दुकान तक तो आई थी। जरूर बंगले में आई थी। ....नीचे चलते लोगों ने गोली की आवाज़ सुनी थी तुमने उसे....’





डिसूजा उसके प्रश्नों से अंदर ही अंदर तंग आ चुका था। अपने अपराध बोध से भी भीतर ही भीतर घबराहट में था। उसका पीने का मज़ा भी किरकिरा हो गया था। सामने अच्छरी बिफरी शेरनी सी प्रश्नाकूल खड़ी थी। जब उसने सड़क पर चलते लोगों की बात सुनी तो वह डर गया। और सोचने लगा। सोचते उसे जाने क्या सूझी कि बोला, ‘वह यहीं है भीतर। तेरे डर से वो गुसलखाने मे छिपी है। जाकर देख लो।’ हड़बड़ाई अच्छरी गुसलखाने में चली गई। वह अवाक। चीख नहीं निकल सकी उसकी। तभी एक ठाँय और हुई। अच्छरी वहीं ढेर हो गई। उसने माली और खानसामें की मदद से गुसलखाने में गड्ढा खोदा और दोनों को वहीं दबा दिया। दोनों को मुंह बंद रखने के लिए भारी इनाम दिया। पर कुछ भी हो दीवारों के भीतर की बात कभी न कभी बाहर निकल ही आती है।
 राबर्ट की बदली का समय अभी नहीं हुआ था मगर उसने अधिकारियों पर जोर डाल बदली करवा ही ली। उसने कम्पनी से खानसामा और माली को भी अपने साथ ले जाने की इज़ाज़त ले ली और चला गया।

इधर जब मां-बेटी घर नहीं आई तो अच्छरी का पिता चौंका। वह ढूँढता बंगले तक गया पर किसी ने कुछ नहीं कहा। वे नई तो थी नहीं कि कोठी में पहली बार आती। वे सामान्य तौर पर आने-जाने वाली थीं। कौन नोटिस लेता। शिमला तब इतना घना नहीं था। छितरी आबादी में क्या पता, कहाँ गई। बंगला बंद था। भीतर से न कोई आवाज, न रोशनी। कहाँ गए हांगे सब? प्रश्न तैरने लगा। आस-पास के गवाले भी चौंके। कहाँ गुम हो गई दोनों, फिर कम्पनी के दफ्तर से पता किया कि राबर्ट तो चला गया। उसके साथ वह अपने कर्मचारी भी ले गया है। अच्छरी के पिता ने सोचा, ‘गुलाबो उसे दगा दे गई। वह अंग्रेज के साथ भाग गई और अच्छरी को भी ले गई।’ उसने अंग्रेज को एक जोर की गाली दी और परेशान धड़कते दिल से वापस आ गया। कहीं चुपके-चुपके फुसफुसाहट में यह आवाज़ तैर गई कि डिसूजा ने अच्छरी को मार दिया है और गुलाबों को ले गया है। कि गुलाबो को मार दिया है और अच्छरी को.....। बंगले से गोली की आवाज़ तो सुनी थी। पहले तो कभी नहीं सुनी। यह चर्चा कुछ दिन चला और फिर सब शांत। समय बीता। कम्पनी मुख्यालय से डाक बंगले की सफाई और लिपाई के आदेश आए और छः महीने बाद एक नया मैनेजर नियुक्त होकर आ गया।

चूंकि कम्पनी का अपना डाक बंगला था इसलिए उसके ठहरने के लिए मुख्यालय से ही सेट की अलॉटमेन्ट हो गई थी। वह अपने कमरे में सोया था। गहरी नींद। एकाएक उसकी नींद टूटी। उसे कुछ आभास सा हुआ। उसे लगा बाथरूम से कोई भीतर कमरे में घुसा है। उसे साथ वाले कमरे से उसे ऊँचे बोलने की महिला आवाज़ भी सुनाई दी। सोचा उसने कि साथ वाले सेट में कोई अधिकारी आया होगा...वे बोल रहे होंगे। नींद में खलल पड़ गया था। उसे लगा उस कमरे में उज़ाला भी है जो बैठक वाले हाल में आ रहा है। तभी ठाँय की आवाज हुई और आवाजें बंद। वह चौंका। शौच करने बाथरूम में गया। फिर बाहर आया। हाल और कमरे की रोशनी जली थी। खूब रोशनी। मगर न हाल में कोई था न भीतर कमरे में। उसने आहट ली। पास से भी कोई आवाज़ नहीं। पूरा पहाड़ सन्नाटे में डूबा। वह किंकर्व्यविमूढ़ सा खड़ा रह गया। विचारता--क्या उसने सपना देखा? कि वह अभी भी.... उसे लगा उसके सामने कोई खड़ा हो गया है। साया था। मगर दिखा नहीं। तभी कहीं से आवाज़ आई, मैं अच्छरी हूँ। कोमल अंग्रेजी भाषा। मैंनेजर की घिग्गी बंध गई। मैनेजर को यकीन हो गया कि इस बंगले में तो भूत है। उसने अगले दिन नए भवन में अपना आवास बदल दिया। कुछ दिनों बाद उसने अपनी बदली मसूरी के लिए करा दी। उसने मित्रों से कह दिया कि शिमला के उस बंगले में तो भूत रहता है। फिर सारी कहानी।
एक पर एक छः अधिकारी कम्पनी की ओर से तैनात हुए। सबने यह सिद्ध कर दिया कि अमुक बंगले में तो भूत है। सातवें मैनेजर को मुख्यालय में ही पता लग गया था कि जो बंगला उसे अलॉट हुआ है, वह भूत बंगला है। मगर न ऑफिस इस बात को मानता था, न वह मैनेजर। यूँ भी वह युवा था। भीतर उमंग थी। काम करने का ज़ज़्बा था। बोला, वह भूत-वूत को नहीं मानता। आदमी का मन बड़ा होना चाहिए। डर से सब कुछ उल्टा लगता है। और वह आ गया। बंगला खुलवाया। साफ-सफाई की और काम आगे बढ़ा।
एक दिन वह सोया था। उसी तरह गुसलखाने का दरवाजा खुला। जोर से बोलने की आवाज़ें आइंर् और बंगले की रोशनी जली। वह उठा नहीं। मगर संयत हो अपने बिस्तर पर बैठ गया। सिरहाने रखी पिस्तौल हाथ में। तभी उसके कमरे में एक साया प्रवेश कर गया। उसने देखा, एक नौ जवान लड़की। अंग्रेजी तरीक्के से बाल बनाए। पहाड़ी परिधान में उसके कमरे के कोने में खड़ी है। मैनेजर का नाम नहीं स्मरण, पर चलो कथा के लिए इतना जरूरी भी नहीं है। बात बन रही है। दोस्त ने कहा।
अंग्रेज मैनेजर ने पहले समझा कि कोई चोरी चकारी के लिए भीतर घुसा है। उसने हाथ में ली पिस्तौल उस ओर तान दी। वह पिस्तौल दागता, कि उस काया के ओंठ फरफराए। नहीं। डरो नहीं। मैं चोर नहीं हूँ। न ही ऐसी-वैसी हूँ। मैं नुकसान नहीं करूंगी। निश्चिंत रहे। पर मेरी बात सुने। साये के आश्वासन और सुरीली आवाज़ अपनी भाषा में सुन वह संयत हो गया। पूछा-‘तुम कौन हो? यहाँ इस समय?’
‘मैं यहीं पड़ी रहती हूँ। वर्षों से। मेरा नाम अच्छरी है।’
‘अच्छरी! यह तो हिन्दुस्तानी नाम है और तुम?’
‘हाँ! मैं हिन्दुस्तानी ही हूँ। मगर...।’
‘मगर क्या?’
‘तुम मेरी मदद करने का वायदा करो पहले। मेरे साथ अन्याय हुआ है।’
‘कैसी मदद?’
‘मेरे गुनहगार को सज़ा दिलाने की।’
‘ठीक है।’
‘पर मैं भूखी हूँ। कुछ खाने को है?’
‘हाँ! तुम खा लो रसोई में ब्रेड होगी?’
और वह रसोई में चली गई। पीछे-पीछे मैनेजर भी। उसने देखा। रसोई में उजाला हो गया था। मानो उसने पहले ही बल्ब  जला दी हो। फिर ब्रेड का पैकेट खुला। उसने उसे खोलते हाथ नहीं देखे। उस उजाले में उसने प्लेट से कौर उठते देखे। एक जगह तक आते और खत्म हो जाते। उसका दिल फिर धड़कने लगा था। मन ही मन सोचता, ‘ये क्या हो रहा है?’
तभी एक दोस्त बोला, ‘यार! ये गलत है। अशरीरी आत्माएँ खाना नहीं खाती। ढकोसला है। बन्द कर इसे। कोई और गल्ल लगा।’
‘यार! मुझे जैसी दादा ने बताई तुम्हें सुना रहा हूँ। अब सच क्या है यह तो बाद में पता चलेगा।’

तीसरे दोस्त ने कहा-‘यार! सुना तू। कोई चूतड़ बात करने से बेहतर तो लोक कथा सुनना अच्छा है। वह खाती थी या नहीं इससे क्या? पर गीत कैसे बना इसकी कहानी बताओ।’
‘भई उसी तक तो आ रहा हूँ। ये बीच में। कथा सुननी हो तो धैर्य तो चाहिए ही। हुंकारा भी।’
‘ठीक है।’

....खाना खाकर वह फिर कमरे में आ गई। मेरे बारे में इतना तो जान गए न आप। पहले छः में से दो ने भी इतने तक ही साथ दिया था। आप सातवें हैं। उनकी तरह भाग नहीं जाएँगे। मैं बता देती हूँ कि तब तक यहाँ कोई नहीं रह सकेगा। मेरा साथ दोगे और मुझे न्याय दिला दोगे तो तुम्हें कुछ नहीं होगा।
‘कैसा न्याय?’
‘मेरे साथ और मेरी माँ के साथ घटी घटनाओं के कारक को सज़ा दिलाकर। काम कठिन है, मगर इतना भी नहीं।’
‘ठीक है, वादा रहा। मैं करूँगा। मगर पहले मुझे सारा मामला समझाना होगा।’
‘हाँऽ।’
‘बोलो। पर....’

‘मुझे देखना चाहते हैं तो पहल अपने कमरे की ये रोशनी बुझा दो। यहाँ दूसरा प्रकाश हो जायेगा। आप मुझे देख सकेंगे।’
और अच्छरी रात भर उस मैनेजर को अपनी कहानी सुनाती रही। कैसे वह आया? कैसे यह बंगला बना। कैसे वे दोनों माँ-बेटी उसके नजदीक आई? इत्यादि। (पाठक यहाँ तक जानते हैं। भीतर की बारीकियाँ समझी जा सकती हैं कि माँ-बेटी की अंग्रेज के साथ कैसी अन्तंरग बातें होती रहीं और तब इस अंजाम तक पहुँचे।)







पूरी कहानी दो-तीन दिनों की बैठकों में समाप्त हुई। अंग्रेज मैनेजर को कहानी में रुचि आने लगी थी। उसने अपने दफ्तर में छान-बीन शुरू कर दी थी। पता चला कि अमुक मैनेजर राबर्ट डिसूजा अचानक बदली करा कर इंगलैण्ड चला गया है। उसने अपने सेवादारों को कुछ दिन अपने साथ मसूरी में दूसरी नौकरी पर रखा। फिर उनका पता नहीं चला कि वे कहाँ गये। रिकार्ड में कुछ भी दर्ज नहीं।

मैनेजर को मामला पेचीदा लगा। मगर अब कुछ कागज पत्र उसके पास थे। हत्या के गवाह भी थे। मगर चश्मदीद कोई नहीं था। उसने रात को अच्छरी से बात की। होता यह था कि मैनेजर को अच्छरी से लगाव हो गया था। वह उसके साथ बतियाता रहता। वह भी रात को गुसलखाने के दरवाजे को खोल भीतर आती थी। वह पूछता भी था, ‘तुम कहाँ से आती हो?’ वह कहती तुम मेरा केस आगे करो मैं सब बता दूँगी।’ मित्रां, कहते है-कमजोर से कमजोर आत्मा भी मरने के बाद सशक्त हो जाती है। अच्छरी अब दृढ़ संकल्प थी कि उसके हत्यारे को सज़ा मिले।

मैनेजर ने पूछा-‘चश्मदीद गवाह नहीं है।’ वह बोली, ‘आप ड्राफ्ट तैयार करो, मैं हस्ताक्षर करूँगी। एक गवाही मेरी भी। बाकी आप देख लो। सुना है अंग्रेज न्यायप्रिय होते हैं।’
‘तुमऽ हस्ताक्षर करोगी!’ चौंका मैनेजर।

‘हाँ! मैंने संकल्प लिया है। मेरी माँ को भी धोखे से मारा गया है। पहले उसने हमें अपने प्रेमजाल में फंसाया। अपना मतलब हल किया और जब हमें जरूरत पड़ी तो....मेरे पेट में बच्चा था इसलिए मैं पुठपैरी हो गई हूँ। माँ की आत्मा में उतनी ताकत नहीं है। बस यह मुझमें ही है। मेरा बच्चा और मैं न्याय चाहते हैं।’ वह रुआँसा हो गई।

हतप्रभ मैनेजर अगले दिन दफ्तर से केस तैयार करवा कर ले आया। अच्छरी ने कहा, ‘एक पेन और कागज मेज पर रख दें। साइन हो जाएँगे।’ और मैनेजर ने देखा कि अच्छरी के साये ने पेन उठाया, स्याही में डूबोया और कागज पर हस्ताक्षर कर दिए। मैनेजर सुंदर लिखावट देख अचम्भित रह गया। कहा-‘अरे तुमने तो...।’

‘हाँ! ये सम्भव है। आप आगे बढ़ो। मुझे न्याय दिला दो। और भाई, मुकद्दमा दायर हो गया। कई पेशियाँ लगी। पहले तो जज ने इस तरह की ऊल-जलूल प्रार्थना को स्वीकार नहीं किया मगर पेशकारों(प्लीडर) ने यह निवेदन किया कि सत्यता जानने में हर्ज क्या है। छानबीन तो की जा सकती है। आवेदन में सारे तथ्य क्रमवार वर्णित हैं। अनमने से जज ने ओंठ गोल कर पेशकार की बात आदरवश मान ली। सारे दस्तावेजों की छानबीन शुरू हुई। जब सत्यता प्रकट हुई तो उस अंग्रेज मैनेजर को बुलाया गया। पहले तो वह मैनेजर के दावे को झूठा और मनगढ़त कहकर टालता रहा-मगर न्यायप्रिय अंग्रेज शासकों ने उसे आने पर मजबूर कर दिया। चारों और हल्ला मच गया कि अच्छरी और गुलाबो कहीं भागी नहीं बल्कि उनकी हत्या बंगले के मैनेजर ने की है। उनके शब कहीं दबा दिए गए थे। और वर्तमान मैनेजर अच्छरी का मुकद्दमा लड़ रहा है। कि न्यायालय का जज भी हैरान था एक आत्मा कैसे अर्जी दे सकती है?..पर भाई उसे मानना पड़ा। उसने लिखा था कि वह पायनियर स्कूल की छात्रा थी। रिकार्ड देखो। वह  वहाँ भी जा सकती है। यदि जज वहाँ आए तब मैं अपना ब्यान लिख सकती हूँ। बाहर जाना मुश्किल है। और उसने सारे कागज़ों की सच्चाई की पड़ताल की। कागज सही थे। फिर मानना पड़ा। तब एक दिन ब्यान की बात उठी। यहाँ मैनेजर थोड़ा ढीला पड़ गया-ब्यान कैसे होंगे? उसने अच्छरी से बात की। बोली, ‘ठीक है मैं ऐसे ही बयान लिखूँगी जैसे यहाँ लिखा। करूँगी दस्तख़त।

...और मैनेजर ने अच्छरी का लिखा एक और कागज जज को थमाया। जज हैरान। उसने उच्चाधिकारियों से बात की। तय हो गया कि अच्छरी की लिखावट की जाँच भी हो और बयान भी लिया जाए। अधिकारी को सज़ा तभी हो सकती है।
और एक दिन अच्छरी के बयान के लिए तय हो गया। अच्छरी दिन में भी वहाँ जाने को तैयार हो गई। उसे बहुत गुस्सा था। नियत दिन कोर्ट लगा। कोर्ट में सबके बयान हुए। जब अच्छरी की बारी आई तब उसने मैनेजर के कान में कहा-जज साहब को सीट से हट कर सामने बिठा दिया जाए। कागज और पेन मेज पर रख दें। फिर देखना। जज ने नियमों के विरुद्ध मान लिया। वे सामने से देखते रहे। खाली मेज पर पेन हवा में उठा। दवात से स्याही लेता और लिखता जाता। ऐसा लगा पेन स्वयं अपनी दास्तान लिख रहा हो। कुछ देर बाद पेन एक ओर लेट गया। मैनेजर ने कहा कि बयान समाप्त हो गया। जज ने देखा, सुन्दर लिखावट में बयान लिखा गया है। जज ने स्कूल की प्रधानाचार्य से अच्छरी की लिखावट को मेल करने को कहा-उसने हामी भरी।

अब ज़िरह की बारी थी। अच्छरी ने मैनेजर से कहा कि जो भी सवाल पूछने हैं बोलें जाएँ वह उनका उत्तर  वह कोने से देगी। मेरी आवाज़ मेरी वार्डन से तस्दीक की जाए। बस मुझे पकड़ने या सामने आने के लिए न कहा जाए। और यह हुआ। सब हैरान। एक प्रेतात्मा ने गवाही दी।

जज ने अच्छरी की गवाही को मान लिया। उसने एक और साक्ष्य के लिए मैनेजर को हुक्म दिया कि वह जाए और अपने गुसलखाने की खुदाई करे। जो मिले उसे बताएँ।
और भाई खुदाई हुई। उसमें दो कंकाल दबे मिले। पिस्तौल से दागी गोलियाँ भी। अच्छरी ने ब्यान में लिखा था कि हत्या के बाद उन्हें गुसलखाने में दफना दिया गया है। तब खानसामे और माली को भी ढूँढा गया। वे दूर गाँव में रहने लगे थे। उनकी भी गवाही हुई। और सिद्ध हो गया कि राबर्ट डिसूजा हत्यारा है।

चारों ओर अच्छरी की आत्मा की गवाही का चर्चा उठा। संवेदना की गहनता से तभी एक गायक ने गीत बना कर गाया-तू मारी अच्छरिए तू मारी, बेऽ। कम्पनी रे बाबूए तू मारी रे...।

कालान्तर में मारी शब्द पर सामान्य जनों में अश्लीलता के आरोप लगा कर एतराज होने लगा। ‘मारी’ शब्द ‘मोही’ में परिवर्तित हो गया। जो लगभग ठीक भी था। अच्छरी के नाम की उसी तरह सुन्दर और अंग्रेजों के यहाँ नौकरी करने वाली और भी अच्छरियाँ निकलीं। आज लोग इतना जानते हैं कि वो अच्छरी तो पता नहीं थी भी कि नहीं पर फलाँ अच्छरी के बारे वे जानते हैं। कोई कहता है, वह बाघल, जनपद की थी, कोई कहता कोट-कहलूर जनपद की थी। मगर गीत अब नए रूप में गाया जाता है। अनेक लोक गायकों ने इसे अपने-अपने स्वर दिए हैं।

तू मोही अच्छरिए तू मोही बे ऽ ऽ
कम्पनी रे बाबूए तू मोही बे ऽ ऽ
क्या लैणा अच्छरिए क्या लैणा बे ऽ
खोटे बे रुपइए रा ताँ क्या लैणा बे
न्हाई आई आऊणा अच्छरिए, -न्हाई आऊणा बे
तात्तापाणी मारकण्ड-न्हाई आऊणा बे ऽ ऽ
दुद बेचणा अच्छरिए, दुद बेचणा बे ऽ
कालिया रे मँदरे दुद बेचणा बे ऽ
दुद पेड़े अच्छरिए, दुद पेड़े बे ऽ
दिल मेरा दुखिया न छेड़े बे ऽ ऽ

गीत के बोल समय के साथ कथोपकथन में अपने अन्तरे बदलते रहे हैं। मगर यह सच है कि एक समय था जब अशरीरी आत्माएँ इतनी ताकतवर होती थीं कि वे आदमी के साथ सामान्य व्यवहार कर सकती थीं। इनमें चुड़ैल(पुठपैरी) के बारे में तो सब जानते हैं। पर दोस्तों आस्थाओं की मैल ने उन्हें मन्त्रकीलित कर दिया है।
कथा सुन एक दोस्त ने कहा, ‘बस।’
‘हाँ। अब और क्या होना। कितने गीत किसी न किसी घटना पर ही तो बने र्हैं’
थोड़ी देर तक सब यूँ ही रहे सुन्न से। फिर बातचीत अगले किसी और प्रसंग के लिए टल गई।
००

बद्री सिंह भाटिया
गांव ग्याणा, डाकखाना मांगू
तहसील अर्की, जिला सोलन हि.प्र. 171102
098051 99422
ई मेल  इेइींजपं1947/हउंपसण्बवबउ

2 टिप्‍पणियां:

  1. Achari is one of the most popular folk songs of Arki area but now popular in entire HimachalPradesh, Badri Singh Bhatia has described in a very interesting manner .Never knew the story of Achari.

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