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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

26 अगस्त, 2018

कहानी:

कनपटी का दर्द


सपना सिंह


उसे चक्‍कर आता सा लग रहा है। कोई बात ज्‍यादा देर तक सोच ले तो यही होता है। कितना तो इलाज कराया,पर ये दर्द जब उभर ही आता है। सुनीता जीजी का फोन आया है। आने वाली है, दो कहीने बाद की टिकट है। कोई कमरा देखने को बोली है। मीना भर रहेगी, बच्‍चों से मिल लेगी। बच्‍चों का मोह ही है जो खुद को खतरेमेंडाल चली आती है इतनी दूर से। पर, ममता कहॉं कमरा खोजे, आसपास रखनातो अपनेलिए भी खतरा। कोई देख ले, जीजा को पता चल जाये.... तो पाही लगा के धर देंगे उसके सात पुश्‍तों की। कहीं गडा़से से काट ही न दे सुनीता को। उसके अपने जंजाल कम हैं क्‍या जो ये भी एक सरबत्‍थन आ गया। अजय के आने की तारीख भी नजदीक आ रही। उसके रहने तक एक महीना वो घर से बाहर भी कदम नहीं रख सकती, उसपर बूटी भी बिगड़कर गॉंव जा बैठी है। बूटी का ध्‍यान आते ही ममता की आँखे फिर भर आईं। तवे पर रक्‍खा पराठा धुंधला दिखने लगा। ओमी उसके मुंह पर झुक आया।


सपना सिंह

‘तुम का कल लही हो...’’ तीन साल का ओमी रोने का मतलब नहीं जानता अभी। मॉं की आँखे क्‍यों पानी पानी हो जाती हैं वक्‍त बेवक्‍त। कल रात भी वह उसके बगल में लेटी मुंह पर हाथ धरकर रो रही थी नि:शब्‍द। आखिर ऐसा क्‍या कह दिया बूटी को उसने जो बूटी बिगड़ कर गॉंव चली गयी। बचपन से दूनो भाई बहन को अपने साथ रखी थी। भाई लोग कितना समझाते थे उसको... आपन जी के तो ठिकाना नहीं है, एक बच्‍चा गोद में है ही अब दू जनी को और ले आई। पर ये मोह कैसे छोड़ती। जब शादी करके गॉंव  आई थी तो बूटी आठ नौ बरस की थी और छोटू दस बरस का/ चचिया सास के ये दूनो बच्‍चे हर वक्‍त उसको घेरे रहते। चाचा ससुर साल भर हुए जहरीली शराब पीने से मर गये थे। उस समय बम्‍बई में था ये परिवार, बूटी, छोटू, अच्‍छे स्‍कूल में पढ़ते थे। इनसे बड़ा भाई गुजरात में नौकरी करता था। पिता का साया उठ जाने पर चाची इन्‍हें लेकर गॉंव आ गयी। बच्‍चे खोये से रहते। खसकर बूटी गॉंव के माहौल से बिल्‍कुल सामान्‍जस्‍य नहीं बिठा पा रही थी। स्‍कूल की साखियॉं छूट गयीं थीं। यहां गांव की लड़कियों से उसका मेल नहीं बैठता था। सुबह उठते ही गुडमार्निंग और सोते समय गुडनाईट कहने की आदत थी बूटी को। अब गाँव के रे तरे वाली भाषा न बोलते बनता न समझते। ममता जब शादी होकर आई तो दोनेा भाई बहन को मानो जीवन मिल गया। ममता भी उनसे हिल-‍मिल गयी। वही बूटी आज बिगड़ कर गॉंव चली गयी। ऐसा क्‍या कह दिया था उसने? लड़की जात है, कुछ गुन सहूर न सीखेगी तो कल को सब उसका ही नाम धरेगें-भाभी कुछ सिखार्इ नहीं । थोड़़ा सा ही बोली थी, का बूटी अइसे लउधनापन करियो तो कइसे चली । नहावे के बाद बाथरूम से गंदगी तो साफ कर दिया करो । इतनी सी बात और बूटी दिल से लगा बइठी । सोच-सोच के ममता की ऑंखें भर आतीं । दिमाग में फिर बीती बातें चलचित्र तरह चलने लगीं । वो बातें जिन्‍हे वो भुलाना चाहती पर ज‍ब कोई नया दुख ऑंखें गीली करता पुराना दुख: फिर उपट पड़ता।
बारह साल पहले  जब विवाह  हुआ था, तैसे आज तक सुख मानो
फटकता नहीं। ओमी के होने के बाद पिछले तीन साल से शायद हाथ उठाना बंद है । आज भी उसकी सखियॉं, ननदें, भाभी, भाई, सभी कहते – जो जानों – जबसे ओमी हुआ, तबसे ममता मार नही खाई । ममता फीकी हंसी हंस देती है । मार खाना मानों उसकी नियति बन चुकी थी । पहले तो दो तीन महीने सीधे मुँह बात न करे सिर्फ रात को देह का रिश्‍ता । सुबह उठे तो मुँह ऐसा मानों कुनैन खाया हो । उधर वो बंबई गया इधर ये पेट से हो गयी । फोन करता, बच्‍चा गिराने को कहता, मायके आई, मॉं से कहा । मॉं ने मना कर दिया पहला पेट नसा गया तो बाद में दिक्‍कत होगी । अब जो है, सो हो जाने दे... फिर भले आपरेशन करा लियो ।
वो मायके मे ही थी जब वो आया, और तुरंत चलने का फरमान जारी कर दिया।  मॉं ने मना किया संझा के बेरा , अइसे में नही निकलते। बुरी हवा लग जाती है। पर वो कहाँ मानने वाला था।माँ ने चाय का पूछा, वही बोली चाय तो पीते नहीं दूध दे दो... दूध लेकर वही गयी, रखकर कुछ खाने को लेने अन्‍दर गयी। आई तो दूध वैसे रक्‍खा था। पीने को कहा तो बोला तुम पियो, तुम्‍हे ज्‍यादा जरुरत । जिद पे उतर आया- पियो । मना करने पर जानती थी यहीं तमाशा खड़ा कर देगा । लोक लज्‍जा उसे नहीं व्‍यापती, चुपचाप उठाकर दूध पी ली । माँ के मना करने के बावजूद ‘कुछ नही होगा’ कहकर चल दिया । आधे रास्‍ते ही पेट में अजब सी मरोड़ हुई मानो कोई खुरेच रहा हो । दर्द बढ़ता गया । बरदाश्‍त न हुआԫ तो बोली, दवाखाने ले चलो । बोला चल, सब ठीक हो जायेगा अइसने दर्द है । पर वह दर्द से ऐंठने लगी तो वापस लौट आया, उसे मायके छोड़ अपना घर चला गया । रात भर वह दर्द से तड़पती रही । मॉं, काकू घबरा गये अम्‍मा बड़बड़ाई-कह रहे थे इत्‍ती बेरा न ले जा । सुबह तीन बजे पुतरी की तरह छोटा सा जीव बाहर आ गया । हथेली भर का, ऑंख, कान, नाक, सब बने, नन्‍हे-नन्‍हे होठ भी बन गये थे । कच्‍चा शरीर उसपर बच्‍चा न बचने की सोच ने उसे काठ बना दिया था । न खाने का होश, न पहनने का । महीनों यही हालत रही । एक रात उसकी बड़बड़ से झल्‍लाकर वह फूट पड़ी थी ‘कभी ओकरे बारे में सोचा जिसे आने के पहले ही मार दिये ?
“ क्‍या-क्‍या बोली ? मैं मारा... ” उसकी नजरों से जान गयी कि, जो दूध उसे बड़ी मिन्‍नत से पिलाया था । बाद में अम्‍मा उसे पीर बाबा के पास ले गयी थी, उन्‍होने साफ- साफ बता दिया । दूसरी बार उसने बताया ही नही और जब वह बम्‍बई से आया तो कुनाल पेट में लात मारने लगा था । वह मसमसा कर रह गया । जब तक रहा मुँह फुलाये रहा... बात-बात पर मार पीट । जाने कौन सी खुन्‍नस समाई थी उसे । मॉं-बाप को खरी खोटी सुनाता... उनकी वजह से उसकी ट्रेनिंग अधूरी रह गयी कराते की। नहीं तो जाने कौन सा बेल्‍ट मिल जाता तो वो भी स्‍वतंत्र रूप से बच्‍चो को सिखा सकता था, अभी तो असिस्‍टेंट ही है ।
सुबह 6 बजे तक कराटे की क्‍लास में जाता है फिर आकर नहा धोकर काम पर । ये एक मूर्ति बनाने का कारखाना था, लाखों की मूर्तियाँ बनती थीं बिकती थीं। शाम को वह बाल काटने का काम करता। सपना था कि पैसा इक्‍कठा करके एक दुकान बना लेगा ‘ हेयर कटिंग सैलून । सामान तो सब है उसके पास, बस दुकान नही । कराटे भी सिखाने लगता, जिंदगी बन जाती । पर ये शादी की बेड़ी । अपनी खुन्‍नस निकालने का यही एक रास्‍ता समझ में आता । जब तक रहता सिर्फ मुँह टेढ़ा करके ही बात करता । न खुद सोता न उसे सोने देता । कभी उसके व्‍यवहार से आहत होकर उसे परे करती तो और गाली खाती काहे आयेगी पास कउनो यार रक्‍खी है न, वही पास जा उसकी छाती पर बैठ मुँह दबाकर एक हाथ से चॉंटे मार मार गाल सुजा देता । कभी सर पकड़ कर सीधे दीवार पर दे मारता । बूटी की अम्‍मा सुबह उसकी लस्‍त देह और अड़हुल के फूल जैसी सूजी ऑंखे देखकर गहरी सांस लेकर यही कह पाती- ‘फिर नही सोई न ममता...’ वही बेचारी को कभी कभार उसका पक्ष लेकर अजय को डपट देती  थीं। बाकी घर में जैसे किसी की ऑंखे ही नहीं थीं। जब अजय मारपीट करता तो सास ससुर कोई न कोई काम से बाहर निकल जाते। कभी बूटी की अम्‍मा बोलती दादी बैठी-बैठी गला फाड़ती पर वह तो  दानव बना रहता।
ऐसे ही हालात में कुनु आ गया गोद में। पर हालात नहीं बदले इसी बीच देवर का ब्‍याह भी हो गया। देवरानी हर बात में उससे उन्‍नीस थी, इक्‍कीस नहीं पर, किस्‍मत की धनी थी।देवर आगे पीछे डोलता। कभी दूनो जने शहर चले जाते सिनेमा देखने, कभी मंदिर, कभी डोसा, चाट, मोमोज खाने। जो कभी न जाते तो देवर शहर से लौटते में ले आता। अगले दिन कूड़े के ढेर पर दोना, और सिल्‍वर पैकेट देखकर वह समझ जाती कि रात में चाउमीन या मोमोज आया था।
उसे हसरत होती, उसके हिस्‍से में तो चन्‍द कोमल लमहे भी न थे। अजय को तो हर आदमी पर शक था, कभी कादे जो उसके साथ कहीं गयी भी तो घर आकर बेदम मार खायी। उ आदमी तुमको क्‍यों ताक रहा था... तुम उसको पहले से जानती होगी...। वह लाख कहती , वो नहीं जानती, उसने तो देखा भी नहीं उसे कौन देख रहा था। पर उसे कुछ नहीं मानना होता। वह कहती ‘अगर इतना शक है तो उसे भी अपने साथ ले चले। तो जवाब देता-तेरी तकवारी करूंगा कि अपना काम करूंगा। वो कहती, ठीक है कमरे में बंद करके जाना काम पर हॉं कमरे से लगा लैट्रीन, बाथरूम हो। वो कहता- हॉं तेरे बाप ने कोई राजकाज थमा दिया है जो महारानी जी के लिए लैट्रीन वाला कमरा ले लूं, पता है, बम्‍बई में लैट्रीन वाला कमरा कितने में मिलता है?एक दिन इतना मारा‍ कि बेहोश हो गयी। होश में आई तो मन कड़ा करके शहर आ गयी भाई के पास।  भाभी ने बड़बड़ाना शुरू किया, खूब खरी खोटी सुनाई भाई को। उस दिन समझ गई, जब अपना समय खराब होता है, तो कोई साथ नहीं देता, अपने भी मुंह फेर लेते है।
बड़ी जीजी का मकान भी यही शहर में था, कई कोठरियो वाला, सभी किराये से उठा रक्‍खे थे, उसे भी एक दे दिया: अपना एक मालिश का काम और एक झाड़ू पोछे का काम भी दे दिया पर अजय को चैन कहॉं भाइयों को बहनों को फोन करके गरिआता। जीजा को गंदी गाली देता। भाई भी उसे समझाते, गॉंव से काहे आ गयी। दो जून खाने को तो सास-ससुर नहीं तरसाते थे, सिर पर छत थी। ससुराल छोड़ दी तो फिर कहॉं ठिकाना पायेगी। क्‍या वो जानती नहीं थी, भाइयों की सीख के पीछे का छिपा हुआ डर।  बहुतेरे डर थे। एक बहन का अपजस तो ढो ही रहे थे दोनो भाई। वो भी तो, बहने भावज सभी तो सुनीता को मरा बताती। सिर्फ बताती ही नहीं थीं, मान ही चुकी थी मरा हुआ। एक बहन ने जो करतूत करी थी दूसरी भी वही न कर बैठे। फिर अपनी ग़हस्‍थी बिखरने का डर। बहन के प्रति मोह चाहे जितना हो, पर अपनी ग़हर्स्‍थी को खतरे में थोड़े डाला जा सकता।
पन्‍द्रह दिन बाद ही गयी गाँव, सबकी ऑंखो में आश्‍चर्य था। सबने यही सोचा होगा, गयी तो अब न आयेगी। दो दिन रही चलते वक्‍त एक बोरिया गेंहूं, एक बोरिया चावल, दो –तीन किलो के लगभग दाल, आलू, प्‍याज, सब ऑटो में रखवा ली गॉंव में, मालिश, जचगी, शादी, मुण्‍डन, कथा, इत्‍यादि कामों में रूपया की जगह अनाज ही ज्‍यादा मिलता था, सो उसकी कमी घर में नहीं थी। बाबू और दद्दा बाल बनाने भी जाते थे तो पैसा भी रहता था। देवर का शहर में श्रृगार पटार की दुकान थी ही।
पन्‍द्रह दिन पर वह एक चक्‍कर गॉव लगा आती। इस बीच उसे एक ब्‍यूटी पार्लर में भी काम मिल गया साफ सफाई का। ब्‍यूटी पार्लर वाली दीदी ब्राह्मण थी। अक्‍सर मोनिक्‍योर, पेडिक्‍योर वाली कस्‍टमर उनसे अपने पैर छुआते हिचकिचातीं पाप लगेगा, कहकर। उन्‍होने ममता को सिखा दिया फिर धीरे-धीरे ममता ने बहुत कुछ सीख लिया। थ्रेडिंग, वैक्सिंग, क्‍लीन-अप में उसका हाथ साफ हो गया था। उधर अजय को पता चला तो तांडव शुरू कर दिया। ब्‍यूटी पार्लर में काम करने वाली सभी लड़कियॉं औरतें वेश्‍या होती हैं। वह समझाने की कोशिश करती-ऐसा नहीं है। दीदी का इतना बड़ा घर है, सास, ससुर है बच्‍चे हैं, आदमी है उनके यहॉं ये सब नहीं होता। पर अजय के दिमाग में जो बात एक बार घुस गयी तो घुस ही गयी। इस बार आया तो इसी बात को लेकर लड़ बैठा, फिर मार पीट, गालियॉं! मायके वालों को तो सब दिन गरियाता था, भाई को जीजा को किसी को नहीं छोड़ा इस बार बाप को गरियाने लगा। तेरा बाप ससुर तुझे राखे थे, तुझसे धंधा कराता था। रंडीवाजी की आदत है तुझे। जभी तो पार्लर में काम करती है। उसकी ऑंखो के आगे नीरीह बाप का चेहरा आ गया। जाने पस्‍त देह में कहॉं की शक्ति आ गयी। झटपट उठी थी और खींच कर एक चांटा उसके मुह पर धर दिया-कान खोल के सुनि लेख, तू  जो हमें एतना मारते गरिआते हो न हमार इज्‍जत नाहीं खराब होत है अइसे। पर हम जो सबके सामने पएक झापड़ भी लगा देव न तुमका तो सब इज्‍जत मिट्टी हो जाई तोहार।
अजय की एक रट थी, कि वह पार्लर की नौकरी छोड़ दे, वह खर्चा भेजेगा, भाइयों ने समझाया, जैसा कहता है वैसा कर लो- हर्ज क्‍या है। आखिर उसने छोड़‍ दिया।  पार्लर वाली दीदी खूब गुस्‍साई-एक हुनर आ रहा था हाथ में अपना ही नुकसान कर रही हो। कहो तो  मैं बात करूँ उससे । पर उसने मना कर दिया, जानती थी अजय को कोई नहीं समझा सकता। अब तो पांच साल हो गये पार्लर छोड़  घर पर ही सिलाई करती है। कभी कभार मालिश का काम मिल जाता है। महीना सवा महीना जच्‍चा बच्‍चा की मालिश करने का अच्‍छा पैसा मिलता है। एक समय का अस्‍सी रूपये। कभी-कभी  पार्लर में  कुछ औरतें आती थीं मसाज करवाने脉! दीदी को करते देखा उसने... खुद भी किया था कई बार: देर सारा तेल चपोर कर धीरे-धीरे सहलाते हुए बस उंगलियों को घुमाना। उसे हंसी आती। ऐसे होती है कहीं मालिश? दम लगाता है। शुक्‍लाईन के पैर में फाटन चढ़ती है तो ममता को ही बुलाती। ममता ऐसी मालिश करती की सारा दर्द उड़न हू हो जाता। पार्लर में तो एक बार की मालिश का दीदी पांच सौ लेती थीं। पर उसे कौन देगा इतना,  उसे तो अस्‍सी के लिए भी झिकझिक करनी पड़ती है। छोटी भाभी सिर्फ मालिश करके ही कितना कमा लेती है। उधर का पूरा मोहल्‍ला वही जाती है। पर वह तो सारा दिन यही काम नहीं कर सकती। ओमी अभी छोटा है। फिर अजय के आने पर उसे काम छोड़ना पड़ता है। साल में दो बार एक महीने के लिये आता है पर वो एक महीने उसके लिए आता है पर वो एक महीने उसके लिए दु:स्‍वप्‍न से बीतते हैं। कहां जा रही, क्‍या कर रही, वहॉं क्‍यों देख रही ... हर  वक्‍त की कड़कड़। आजकल नया ओरहन है- बच्‍चों का ध्‍यान नहीं रखती। कोई काम ठीक से नहीं करती। सच भी था, अजय के रहते उसका कोई काम ठीक से नहीं होता। कभी चूल्‍हे पे चाय फदक जायेगी तो दाल जल जायेगी। बच्‍चे भी कहना नहीं सुनते उसका। बस पापा पापा करते रहते। कुनाल को अपना मानने से इंकार किया था अजय ने। बोले, मेरा नहीं है जिस यार के पास से लायी है, ले जा वहीं।
पर अभी तो चिन्‍ता जिज्‍जी की है। जब गयी थी तो किसी का मोह नहीं की थी। न ब्याही हुई बेटी के ससुराल में सम्‍मान की फिक्र हुई। न जवान होते बेटों के शर्मिदा होने की। न विवाह लायक बेटी के भविष्‍य की चिन्‍ता की, न हाड़-मास गलाकर बनाये गये घर के प्रति मोह जागा। बस निकल ली, सब छोड़ कर मरने। बताती तो यही है, मरने ही गये थे। नदी किनारे चप्‍पल,चूड़ी, उतार कर रख दी थी, जाने क्‍या सोच कर पण्डित को फोन लगा बैठी, शायद यही एक मोह बचा था, मरने से पहले उसे बता दे, बेचारा कहॉं ढूढ़ता फिरेगा उसे। पंडित हड़बड़ा गया, बोला कुछ न करिहे, तोहे हमार कसम बस  एक बार मिलने दे, बात करना है, फिर जो जी में आये करिहो। पर हमरे आने तक वहीं रूकि रहो।
वह बिना खाये पीये डेढ़ दिन इन्‍तजार करती रही। जानती थी, घर में कोई चिन्‍ता नहीं करने वाला, जब भी ऐसा होता वह घर से दो तीन दिन के लिए टर जाती थी, गॉंव में ही किसी के घर पनाह लेती या टैम्‍पो करके दूसरे गॉंव रहने वाली बहन के घर चली जाती।
पण्डित ने पहले तो बहुतेरा समझाया, घर लौट जाने को कहा-मत फोन कर हमें, जो ओके शक है तो। न बात करना, फोन पटक दे ओकरे माथे पर जैसा उ कहे वही कर। मरके का मिली? लइके अनाथ हो जइहें। मानुख का देह एक दिन तो खतमें होई, अपने से काहे इका अंत करै। पर वह टस से मस नहीं सिर्फ एक रट, लौट के अब उ घर में कदम न रखिहों, जी फाट गया है जीने का कोई चाव नहीं, अच्‍छा  है, आ गये, तुमसे भी दुआ सलाम हो गया जाति बेरा।
पण्डित, एक टक उसकी ऑंख में ऑंख डाल कर बुदबुदाया हमरे साथ चलेगी...?
‘’पागल हो गया है क्‍या इ मनई...’’ सुनीता जानती थी पण्डित बाल बच्‍चेदार आदमी है।
‘’तू बोल , हमरे साथ चलेगी?
कहॉं ले जायेगा...? ‘’अपने घर?’’
‘’नहीं...तू आपन दिया छोड़ ठिया तो हमहूं आपन ठिया छोड़ देब... फिर जहॉं किस्‍तम! पर तुम्‍हें मरने इहॉं न छोड़न!
कितनी कम पहचान थी सुनीता की पंण्डित से। सात महीने पहले छत्‍तीसगढ़ के बालाघाट से फोन आया था इन्‍हीं पण्डितजी का कि उसके आदमी का एक्‍सीडेंट हो गया है। देवर के साथ गयी थी वो। पण्डित जी ने हर तरह से मदद की थी। रूपया पैसा- देह जांगर सबसे। उस परदेस में देवता बनकर खड़े रहे! ड्राइवर थे टिरक के उसके आदमी की तरह ही। पर, उतना दोस्‍ताना न था, बस आते जाते दुआ सलाम हो जाती किसी ढ़ाबे पर एक्‍सीडेंट की खबर उसने ही दी थी फोन पर। कैसी ठहरी हुई मुलायम आवाज थी। उसने आजतक अपने आस पास के मर्दों को इ लहजे और ध्‍वनि में बात करते नहीं सुना। सामने से देखा तो जान पाई पण्डित  को। उस परदेस में हर तरह की मदद की उन्‍होने। कभी गलत निगाह से नहीं देखा। फिर अब इ उमर हो गयी थी उसकी दामाद उतार चुकी थी,  उसे कोई का गलत नजर से देखेगा आदमी सक्‍की था, पर इधर बिटिया के ब्‍याह के बाद उहो शान्‍त हो गया था। वहीं अस्‍पताल के गम्‍भीर वार्ड में या बाहर ओसारे में पण्डित देर-देर तक बैठे रहता। कभी वो देवर को बेड के पास बिठा बाहर आ जाती। उसी बात-चीत में पता चला पण्डित की घरवाली गॉंव में है। तीन लड़के हैं। महतारी बाप घेरघार के शादी कर दिये थे। बाकी अपनी घरवाली उसे कब्‍बो पसंद नहीं आई। पमपिलाट सी तो है। हट्टी कट्टी। जब बियाह के आयी थी तभै मेहरारू जैसी लगे थी,  नयी लरकोरी नहीं। घर में तो बस गयी पर दिल उजाड़ ही रहा। सुनीता को मन ही मन खूब हंसी आती पण्डित की बात पे। खूब कहते हैं... बिना दिल में बसाये ही तीन तीन लइकन के बाप बन गये? वो भी तो पांच बच्‍चन की महतारी है, पति के लिए तन मन से खटती रही... कितनी सलीके और सुघड़ता से घर को संवारा सारे ब्रत उपवास रहे पति और परिवार की भलाई के लिए नियम से कुलदेवता की पूजा की आज उसके अस्‍पताल में पड़े होने पर कितनी असुविधा उठाकर यहां पड़ी है,  पर सच पूछों तो क्‍या सच में वह कह सकती है कि वह उसके दिल में बसता है।
वही 15-20 दिन का परिचय था पंडित से । अस्‍पताल से छुट्टी हुई तो घर आ गयी। सदा का शक्‍की मर्द अब बिमारी में पड़े पड़े और उग्र हो गया था। आंख से ओझल हुई नहीं कि चीखना पुकारना शुरू। दिशा मैदान जाती तो साथ जाता, थोड़ाआड़ लेकर बैठती तो चीखता, उधर काहे जा रही, यही बैठ, गांव भर में तमाशा कर रक्‍खा था। जवान बेटे-बेटी के सोने तक का इंतजार न करता, सकारे कमरे में बुलाने लगता, वह संकोच करती जाने में जवान बेटा बेटी के सामने खटिया पर कइसे पहुंचे। पर उ तो आंखी निकाल-निकाल धमकाता। बेटी उसे ठेलती, जा रे अम्‍मा कमरे में नही अबे मारे लगिहें बप्‍पा। वह सांस रोके उसके बगल में पड़ी रहती। वह वहाशिर्या की तरह उसे नोचता झंझाड़ता फिर थक कर सो जाता। पर वह सारी रात जगती। बिस्‍तर के नीचे रखी दँराती की धार उसे सोने नहीं देती थी। हर वक्‍त एक भय समाया रहता। जरा देर को ऑंख झपकती तो सपने में वह दँराती लेकर उसकी गर्दन पर सवार दिखता। पसीने पसीने वह उठ बैठती सूखते हलक को पानी से गीला करने चारपाई से नीचे उतरती दबे पांव तो भी वह उठ जाता फिर वही गाली गलौज- अपने यार से मिलने जाती रही चोरी से, गाली, मार उसी रात में रोहा पीटा! जीवन नरक बना दिया था उसके शक ने। नहाने, खाने, गहने मूतने हर कहीं सिर पे सवार: कब तक रहती ऐसे डर-डर के। एक ही उपाय सूझा था, नदी में कूद जाये सारे झंझटो से एक बार में ही मुक्ति। कौउन जाने सीता माता अइसने आजिज आ के खाई खंदक में कूद गयीं होंगी। लिखने वाले ने लिख दिया ‘धरती में समा गयी।‘ पर जान देना इतना आसान है का। हरहरात जलधारा देख हिम्‍मत छूट गयी। वहीं किनारे कपारे पे हाथ धरकर बैठी थी। मनोमन थी मोबाईल साथा था। कुछ न सूझा तो पंडित का नम्‍बर दबा दिया था।
अब पंडित सामने बैठा था, उससे पूछ रहा था- साथ चलेगी। इस आदमी में जाने का है, बिना कुछ कहे मन बांध लेता है। जाने क्‍यों इस वक्‍त वह सब भूल गयी। न बेटा ध्‍यान आया, न बियाही गयी बेटी ध्‍यान आई। न जवान बेटी का ख्‍याल आया। न बूढ़े- मॉं बाप ध्‍यान, बहने रिश्‍तेदारी सब भूल गयी, भाई-भौजाई, भतीजे-भतीजी कुछ ध्‍यान नहीं आया, बस दराती लिए उस आदमी का चेहरा, जिससे उसे दर नफरत थी, जिससे दूर जाने के लिए, उसे मर जाना गवारा था, पर क्‍यों मरे, जब जिंदगी उसके सामने  पण्डित के रूप में खड़ी थी जाने इस आदमी की ऑंखे कैसा भरोसा थमा रही थीं उसे। नदी में कूद जाना कठिन था या उसके साथ चले जाना, उसकी समझ में ये नहीं आया। बस वो जाना चाहती थी कहीं भी... अपने वर्तमान से दूर! दोनौ अपने वर्तमान से नाखुश, विचलित थे, दूर निकल गये। पंण्डित ने उसके मोबाइल के जरूरी नम्‍बर अपने मोबाइल में सेव किये, अपने साथ लाई साड़ी दी पहनने को। चप्‍पल, मो‍बाइल किनारे पर और साड़ी नदी में बहा दोनो चले गये, पीछे ये अफवाह रह गयी कि सुनीता आजिज आकर नदी में कुद गयी। नदी खंगाली गयी, कोई लाश नहीं मिली। वह चली गयी है, परिवार के लोग समझ गये। किसके साथ गयी है कुछ दिन बाद ये भी समझ गये। बच्‍चों ने भी राहत की सांस ली थी जानकर कि मरी नहीं चली गयी है अम्‍मा। यहॉं रहती तो मर ही जाती, या बाप के हाथो मारी जाती।
डेढ़ साल कोई खबर नहीं फिर एक दिन भाई के पास फोन आया भाई चौक गया, बुरा भला कहने लगा- जब चली गयी तो फिर पीछे क्‍यो लौटना? अब लौटकर क्‍यो शर्मिंदा करना चाहती है। उसे लोग भूल रहे भूल गये।
पर कह देने से क्‍या भूल जाता है कोई? वह भूल पाई क्‍या? अपना घर, अपने बच्‍चे? ठीक है, वो चली गयी... गलत की। पर कल को भगवान न करे उनकी बिटिया ऐसा कर लेगी तो? बहन के लिए, भाई का कलेजा कैसा पत्‍थर हो गया। जहॉं महतारी बाप ठेल दिये हम बहनों को वहीं के हो गये सब। कभी बाप से पूछा कि, बहिन की शादी जहॉं करि रहे हो, वहॉं सब ठीक है न। लइका के स्‍वभाव व्‍यवहार सब जॉंच परख लिये हो न पर दूनों भाई में से किसने, कब ऐसी दिलचस्‍पी दिखाई, याद नहीं पड़ता ममता को। बस शादी ठीक हो गयी। ठीक है। बाप ने जो जो काम सहेजा उसे पूरा कर दिया। थोड़ी दौड़ भाग करके अच्‍छा बेटा, अच्‍छा भाई होने का फर्ज अदा कर दिया बस।
ममता कभी – कभी सुनीता के बारे में सोचती हुई आश्‍चर्य से भर जाती है। कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि उसका जीवन इस तरह बदलेगा। सुनीता ने भी तो कहॉं सोचा था, ऐसा कुछ होगा। हालात वर्दाश्‍त से बाहर होते तो सिर्फ मरना याद आता। उस दिन भी मरने ही तो निकली थी, पर जी गयी। प्रेम, सम्‍मान सब दिया पण्‍डित ने, पर कितना सब छूट गया। मानो नया जनम हो,  इसी जनम में। कभी-कभी कितनी बेकली से गॉंव याद आता। ईट गारे से बनाया अपना घर याद आता। तिनका तिनका उसे जोड़ा था अपना हाड़ जलाया था उस घरके लिए,  पूरे घर की धूरी थी वो। कैसे संभले होंगे बच्‍चे। यादें ऑंसू बन कर ऑंख के कगारों को तोड़ बाहर छलक जातीं। पण्डित का जी कैसा तो हो जाता। अपराधी सा महसूसने लगता। कहता, मेरे सामने मत रोया कर, लगता है गलत कर दिया तुझे लाकर। वह अपने ऑंसू छिपाती। ऐसे देवतुल्‍य मनुष्‍्य को कष्‍ट देकर एक और पाप सिर क्‍यों ले।
ममता याद करती है जब पण्डित से पहली बार मिली थी, तो उसने भी उलाहना दिया था। घर छुड़ा दिया बहन का। बच्‍चे अनाथ हो गये, ऐसे नहीं करना था।
पण्डित जी रूऑंसे हो गये- का करें, प्‍यार मुहब्‍बत करते थे, कैसे छोड़ देते मरने को। अब पछतावा होता है। समझना चाहिए था। घर लौटा देते तो ठीक रहता। पर गलती तो हो गयी,  अब का कर सकते... बस निभा देंगे।
अब तो लगभग सभी जान चुके हैं,  सुनीता मरी नहीं। घर वाला एक शातिर। जब कभी आता जोर-जोर सुनीता के लिए। मानों कितना तड़प रहा हो। घुमा फिराकर कहता वो गॉंव के फलाने कह रहे थे वो सतना में देखे हैं। या फिर कोई कह रहा था भोपाल में देखे हैं, या फिर छत्‍तीसगढ़ में है दूनो जन। बड़ी जीजी बरज देती- काहे उके जी को कलपते हो। तुमको तो छोड दी न, अब चाहे मरे या जीये, तुम्‍हें क्‍या? आपन मस्‍त रहो, ऐसी औरत के लिए रोना सोभा नहीं देता मुझको, तुम भी दूसरी कर लो, घर देखने को कोई तो चाहिए।
ममता को दया आती जीजा का बिसूरना देखकर, जी चाहता नम्‍बर दे दे, बात करा दे। पर बड़ी जीजी ने सख्‍ती से मना किया था। कभी भूल के भी उसके सामने जबान न खोला कि सुनीता कहाँ है, वरना उ हरामी उन दोनों जनि को जिन्‍दा न छोड़ेगा। जब तक साथ थी तो रोआइन परान किये थे महाराज अब परेम अधिया रहा है। लेकिन एक स्‍त्री का कोई भी कदम सिर्फ उसे ही नहीं प्रभावित करता। कुनवे की हर स्‍त्री जाने अनजाने उससे प्रभावित होती है। सुनीता का जाना, उसे मरा मान लेना, बस क्‍या बात खत्‍म हो जाती इससे।
ममता तो भुक्‍त भोगी है। आये दिन के ताने। जा चली जा। जैसे तेरी बहन चली गयी। गॉंव क्‍या अभी भी बदला है। हाथ में मोबाईल आ जाने और झोपड़ी पर टी.वी.की छतरी लग जाने से बदलाव थोड़ी आता आदमी तो वही है। मिट्टी, हवा थोड़ी बदली है। ससुर तक शक करते। अभी बाबा ससुर को मछेह खा ली थी, पिछले हफ्ते, गॉंव का एक रिश्‍ते में देवर जा रहा था अपनी बाइक से। भाई-भाभी और कुनाल एक बाईक पर थे वह ओमी को लेकर दूसरी बाइक पर बैठ गयी। पापा अचानक बोले ‘न रे ममती, आज हम स्‍वप्‍न देखे, कि तू दुनो लइकन के लइ के कोरिया के साथ चली गयी। ममता उस दम तो हंस पड़ी थी- का पापा अपना एइसे सोचते हैं। ‘देख बहुरिया तैं जाये तो जाये, हमरे नतियन के मत लै जैहों।
  संशय脉! हर एक निगाह में उसे ले कर संशय रहताहै, उधर बम्‍बई में रहते अजय को दिन रात संशय रहता, इधर ससुर सास के मन में खटका बना रहता। भाइयों के मन भी डर रहता । आज पास के हर हम उम्र अधेड़ मर्द उनकी शक के दायरे में रहते। ममता मन ही मन सोचती है, जो आज अजय बम्‍बई में न रहता, जो वो यहीं उसके साथ रहती तो क्‍या वो उसकी वो बेदमपिटाई और गालियाँ सहती जाती। कभी तो जी भरता उसका। आखिर तीन साल में ही वो उकता गयी। गॉंव छोड़कर शहर आ गयी। अपने बूते कुछ करने। इस समय फिर अजय का दिमाग फिरा हुआ है। जाने कौन उसका कान भर रहा वहॉं कि ममता काम पे जाती है। अटपटे टाइम फोन करेगा-बच्‍चों से बात कराओ- वह कह देगी बच्‍चे स्‍कूल है। ‘अच्‍छा सारे दुनियां के बच्‍चो की छुट्टी हो गयी- तेरे ही बच्‍चे-यारे हैं, जो इस गरमी में स्‍कूल जा रहे’ फिर गालियों की बौछार’ इस बार पैसे नहीं भेजेंगे, चला लेना खर्चा। हम भी जोड़ेंगे पैसा। आखिर वकील को देना पडे़गा।
बूटी को फोन लगायेगा-बूटी झूठ बोलेगी, भाभी नहा रही या भाभी पानी भरने गयी है! जी तो उसका भी उकता गया है। पर क्‍या उकता जाने से कुछ चीजें छोड़ी जा सकती हैं। जीजी तो तेईससाल झेली। मार,गाली,शक सब कुछ। हर दु:ख की एक उमर होती है अपनी उमर बिता कर वह दु:ख भी मर जाता है। फिर से नया दु:ख पैदा होता है जीजी एक दु:ख से छूट गयी, पर हजार दु:ख उसकी जान को लग गये।ममता कैसे छूटेगी¬¬...? उसे कौन तारेगा! वह बार-बार अपने को ये विश्‍वास देती है- नहीं वो जीज्‍जी जैसा कभी कुछ नहीं करेगी। वह कही नहीं जायेगी, अजय भले उसे छोड़ दे, पर वह उसे नहीं छोड़ेगी। जिज्‍जी जैसी किस्‍मत उसकी नहीं। अभी तो जीवन एक अनदेखे डर की लम्‍बी सड़क बना है। जिसपर उसे सिर्फ चलना है, कोई छॉंव नहीं जहॉं ठहर कर सुस्‍ता ले। सिर्फ चलना, चलते रहना।
मोबाईल फिर बजा है, वह बेमन से स्‍क्रीन देखती है। अजय का नाम देख उसके चेहरे का भाव कड़वा जाता है, वह दीवार पर टंगी घड़ी की ओर देखती है- कौन सा बहाना बनायेगी सोचते हुई फोन ऑन कर देती है- उसकी ‘हलो’ सुन उधर से फिर गालियाँ – मादर ... कहॉं घुसड़ी थी इतना देर काहे हुई फोन उठाने में...कमीनी कुत्‍ती... उधर से आवाज तेज और तेज हो रही इधर उसके हृदय में मथानी सा कोई मथ रहा... घ़ृणा मथा कर मानो बाहर आ रही... और अचानक वह चीख उठी... ‘’मादर...’’ तू तेरा खानदान, तेरा बाप, तेरा भाई...तू सन ‘मादर...’
उधर सन्‍नाटा खिचा था और इधर बूटी, छोटू ओभी और बाटर दरवाजे पर आता कुणाल सन्‍नाटा चेहरा लिए खड़े उसे देख रहे थे-पर पता नहीं क्‍यों, वह एक गहरे राहत में थी हर बार की तरह दायीं तरह दायीं कनपटी से उठता तीखा दर्द आज नहीं था... बिल्‍कुल नहीं।
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सपना सिंह की एक रचना और नीचे लिंक पर पढ़िए
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सपना सिंह ’अनहद’ 10/1467 अरुण नगर, रीवा (म.प्र.) 486001 मो.नं.:- 9425833407

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