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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

03 जून, 2018


मैं क्यों लिखती हूँ 

रीता दास राम
   
रीता दास राम

असंभव से वक्त पर वर्तमान जब लिख रहा है अत्याचार, बलात्कार, जुल्म, धर्म-भेद, धर्मांधता, मूल्यों का अवमूल्यन, जुर्म और कर रहा है फ़ांसीवाद की व्याख्या बहुत जरूरी हो जाता है लिखना धीरज, सब्र, सजगता, समानता, मानवता और प्रेषित होना प्रेम .....
नहीं
नहीं लिखती हूँ मैं।
शब्द उतर आते है बरबस। भर के जैसे छलक जाता है पैमाना। नहीं ठहरते है आँसू। तोड़ सीमाओं को उफन जाती है नदी। नहीं ठहरता है दर्द पसर जाती है लहरें सागर किनारे।
विचारों की भीड़ है मस्तिष्क, सोच का जत्था है दिमाग, सीली सीली सी है आत्मा। लिखती जाती हूँ उतरता जाता है बोझ।
धुनती, गुनती, झटक देने की कोशिश हो जाती है जब पूरी तरह नाकाम लिख लेती हूँ।
ग्रीवा में कोई आवाज बगैर स्वर, ठहर जाती है ध्वनि बनते बनते गूंज।
कह जाती है गूंज की आखरी अनूगूंज कुछ शब्द सचेतन लिखती हूँ।
लिखना है जैसे सत्य से मिलाना आँख अंतस के ब्लैक होल से बचाना खुद को।
अभी तो शब्द भी नहीं लिख पाई पूरा। बाकी है शब्दों के ऊपर खींचनी रेखाएँ।
बनाने है संतुलित वाक्य। अर्थ देना है अस्फुट को।
लिखती हूँ कि शब्दों में बची है संवेदना पंक्तियों से आती है सूर्य की किरणें
निष्काषित होता मूल्यों में अंधेरा अभी बाकी है।
जी लूं पूरी जिंदगी रचकर शायद बता पाऊं क्यों लिखती हूँ।
लिखने के बाद भी अक्सर बचा रह जाता है बहुत कुछ
कि अंत अभी बाकी है बाकी है मानव सभ्यता शब्दों में बचा रहे समय इसलिए लिखती हूँ।
समय के बूंद बन टपक जाने से पहले उसे आँख भर देख चाहती हूँ उसकी पारदर्शिता भेदूँ। उसका संगठन लिखूँ। खारिज़ होकर चूक जाने के बीच भी है कई संयोग लिखती हूँ। 
क्यों लिखती हूँ हाथों से पूछ बताती हूँ साजिश तो नहीं, है तो किसकी। भावों की तफ़तीश करती चलती हूँ।
लिखती हूँ जानने गिरता झरना एच2ओ से इतर कुछ है तो है क्या।
विचार कहाँ ठहरते है एक छोर जो पूछ लूं कि अर्थ बुनते है शब्दों में रासायनिक चमत्कार क्यों।
पूछती हूँ दृश्यों से भेजे खत विचारों के तो इशारों की भाषा और व्याख्या लिख लेती हूँ।
जब अटखेलियाँ करती है हवाएँ विचारों में उतरने से पहले बदल जाते है रंग अर्थों के बहुत कुछ कहते है लिखती हूँ।
मनन की प्रक्रिया हो जाती है पूरी बेचैनियाँ बेखटके पंक्तियाँ पकड़ा देती है।
नहीं सीखा लिखना प्रेमचंद, निराला, मुक्तिबोध, तोल्सतोय, शेक्सपियर, दोस्तोवस्की, चेखव, बर्तोल्त ब्रेस्त, वीस्वावा शिम्बोर्स्का, पाब्लो नेरुदा, गांधी, नेहरू, टैगोर आदि आदि से, इन्हें पढ़ा हैं और आश्चर्यजनक रचनात्मकताओं से रूबरू होती चकित रही हूँ।
कोई ताज अपेक्षित नहीं, नहीं क्रान्ति-दृष्टा, युगदृष्टा, साहित्यकार, समर्थ कवि या उत्तम दर्जे की लेखिका सी प्यास, रहे मन साधारण मनुष्य ही।
रहे प्रयत्नरत लेखनी कि शास्वत युगबोध हो मन रहस्य जीवन का ढूँढे बस। 
कैसे सीखे कोई लेना सांस या उच्छवास या गर्भ में साहित्य के वैज्ञानिक तरीके।
कैसे बहना है नदी को ढलान नहीं बताता सागर का पता कि वह खुद है। 
सुनामी को कब आना है कब बदल जाना है पृथ्वी का नक्शा।
भर देना है जगत में तेजाब या पसर जाना है कछारों पर व्यथा का, कौन कह सकता है।
हरयाली बन जाना है एहसासों को या पहाड़ों की चोटियों से छूना है आसमान।
शब्द इमानदारी से खडे हो पंक्ति बद्ध अर्थों की जिव्हाएं टटोलना नहीं होता भारी लिख लेती हूँ।   
लिख लेती हूँ जब सरलता से प्रेषित हो जाए जख्म बन अर्थयुक्त सारगर्भित।
विचारों संग महीनता सी धसती आती है पीड़ा घुमड़ती, प्रतीक्षारत बेचैनी जीना लिखाती है।
लिखना है लेना भरकर सांसें छोड़ने के बाद।
दीप से दीप जलाना जैसे अक्षरों से उकेरना रोशनी वाले शब्द। 
समेटना छटपटाहट से अंकुरती कोमलताओं के शब्द शब्द पंक्तियाँ पंक्तियाँ। 
पहाड़ों सी गिरती संघर्ष धाराओं को पहुंचाना जमीन तक आहिस्ते।
लिखना जैसे सहेजना हॉर्सपावर को भीतर मथना मथना और करना प्रेषित।
टूटकर बिखरना बूंद बूंद जैसे वज्रपात। टूटता हो तारा जैसे पूरी उम्र पर बुढ़ापा।
लिखती हूँ परतों में कतरा कतरा परिंदों के पर खोलती हूँ।
पंछी चहकना कूकना शोर मचाना भूल जाते है और करवट लेना प्रकृति लिख लेती हूँ। 
लिखती हूँ जब टीस को जीती हूँ घूँट-घूँट।
जूगनूओं से पूछ जलना पिरो लेती हूँ।
प्रकाश तेज में हो तब्दील या रातों की तारों से गपशप गुन लिख लेती हूँ
आते आते पास बहुत पास रह जाते हो तुम लिख लेती हूँ
जब समा जाती हूँ ब्रम्हांड में पृथ्वी की तरह और कहते हो तुम आस, होती हूँ तृप्त प्यास लिख लेती हूँ।
लिखती हूँ जब चट्टानों में पाती हूँ जिज्ञासा, राज़, तृप्ति, तमन्ना का सम्मोह।
अजान देता है कोई भीतर, मैं उतार देती हूँ उगे हुए अक्षर, मात्राएँ, अनुस्वार और वाक्यों में शुरूआत और अंत में पूर्णता बुन देती हूँ।
संदिग्ध सी चुभन छील जाने के बाद खोज लेती हूँ दरारों में भीगती बारिश।
लिखती हूँ कि जीती रहे मानवता सभ्यता की कंदराओं में।
बची रह जाय वर्तमान में शर्म कि व्याप्त रहे अंतर पशु और मनुष्य का।
लिखती हूँ कि आदिमता के निशाने पर जीवित होती प्रक्रियाएँ बेतहाशा जीती जंगलराज ख़ारिज कर संस्कृति बचानी है।
प्राणों में स्पंदन, दृष्टि में संवेदना, भावों में आद्रता, हवा में खुशबू हो गणित में सूत्रों की तरह। 
लिखती हूँ कि पुकार है चीख है आंतर्नाद है तपिश है भ्रमित है आवाज भी।
कि जागृत हो सोई सद्बुद्ध अंतर-आत्माएं।
समाज नींद से जागे जागे जग साथ
सन्नाटे को सुनना सुनाना समझना समझाना न रह जाय।
लिखती हूँ कि होती हूँ रूबरू वेदना के इम्तहान से उबरती हुई।
कि लगता है गलत, नहीं मिलना न्याय शोषितो, पीड़ितों, गरीबों, दबी कुचली सभ्यता, बेबसों को, जमीन को, आग को, बोध को, अतृप्ति को।
लिखती हूँ कि जोड़ना है आवाजों में आवाज....
अंतराओं, विराम, अर्ध-विराम और ख़ामोशी में बची है उम्मीद जान ले सभी।
भरोसे को शब्द ही नहीं अर्थ, सभ्यता, परिवर्तन और संस्कृति देना है बाकी।
लिखती हूँ कि लील न ले तमस के अंधेरे जिंदगी होती क्षणभंगुर। 
लिखना है गेलेक्ज़ी में ढूँढना सप्तर्षि तारों के मध्य पाना आलोक।
लिखना है जैसे जीवन का रहस्य आत्मसात कर मिथ्या कल्पना से दूर सत्य को दोबारा है जीना इसलिए लिखती हूँ।
००

रीता दास राम की कविताएं नीचे लिंक पर पढ़िए

https://bizooka2009.blogspot.com/2017/12/2-0-1968.html?m=1




परिचय
नाम :-  रीता दास राम
जन्म :- 12 जून 1968 नागपूर                                               
शिक्षा : बी.ए.(1988),एम॰ए॰(2000),एम॰फिल (हिन्दी) मुंबई
 विश्वविद्यालय (2005), पी.एच.डी. शोधछात्रा (मुंबई)।
कविता संग्रह :-
1. “तृष्णा” प्रथम कविता संग्रह 2012
2. “गीली मिट्टी के रूपाकार” दूसरा काव्यसंग्रह 2016 में प्रकाशित।
कहानी :- पहली कहानी लखनऊ से प्रकाशित “लमही” अक्टूबर-दिसंबर 2015 में प्रकाशित।
सम्मान :-
   1. ‘शब्द प्रवाह साहित्य सम्मान’ 2013 में तीसरा स्थान, ‘तृष्णा’ को उज्जैन  में।
   2. ‘अभिव्यक्ति गौरव सम्मान’ – 2016 नागदा में ‘अभिव्यक्ति विचार मंच’ नागदा की ओर से 2015-16 का।
   3. 2016 का ‘हेमंत स्मृति सम्मान’ गुजरात विश्वविद्यालय अहमदाबाद 7 फरवरी 2017 में ‘गीली मिट्टी के रूपाकार’ को ‘हेमंत फाउंडेशन’ की ओर से।                                   
विभिन्न पत्रिकाओं में कविताएं प्रकाशित :-
‘विश्व स्नेह समाज’ मार्च-अप्रैल 2018, ‘युग गरीमा’ मार्च 2018 (लखनऊ), ‘आजकल’ जनवरी 2018 (दिल्ली), ‘वागर्थ’ जुलाई 2016, ‘पाखी’ मार्च 2016 (दिल्ली), ‘दुनिया इन दिनों’ (दिल्ली), ‘शुक्रवार’ (लखनऊ), ‘निकट’ (आबूधाबी), ‘लमही’ (लखनऊ), ‘सृजनलोक’ (बिहार), ‘उत्तर प्रदेश’ (लखनऊ), ‘कथा’ (दिल्ली), ‘अनभै’ (मुंबई), ‘शब्द प्रवाह’ (उज्जैन), ‘आगमन’ (हापुड़), ‘कथाबिंब’ (मुंबई), ‘दूसरी परंपरा’ (लखनऊ), ‘अनवरत’ (झारखंड), ‘विश्वगाथा’ (गुजरात), ‘समीचीन’ (मुंबई), ‘शब्द सरिता’ (अलीगढ़), ‘उत्कर्ष’ (लखनऊ) आदि पत्रिकाओं एवं ‘शब्दांकन’ ई मैगजीन, ‘रचनाकार’ व ‘साहित्य रागिनी’ वेब पत्रिका, ‘स्टोरी मिरर’ पोर्टल एवं ‘बिजूका’ ब्लॉग व वाट्सप समूह आदि में कविताएँ प्रकाशित।
आलेख लेखन :-
1. “स्त्री विमर्श के आलोक में- प्रेमचंद के उपन्यासों में नारी” - मुंबई की त्रैमासिक पत्रिका ‘अनभै’ (अक्टूबर-दिसम्बर 2014)
2. “अंधेरे में” का काव्य शिल्प - अनभै (अप्रेल-सितंबर 2015)
3. ‘हिन्दी नाटकों का सामाजिक सरोकार’ - हिन्दी विभाग, विज्ञान एवं मानविकी संकाय एस.आर.एम. विश्वविद्यालय, कट्टनकुलातुर, चेन्नई की किताब ‘हिन्दी नाटकों में लोक चेतना’ में प्रकाशित।
4. ‘इक्कीसवीं सदी के उपन्यासों में आदिवासी विमर्श’ – अनभै (अक्तूबर-जून 2016) एवं अन्य
स्तंभ लेखन :- मुंबई के अखबार “दबंग दुनिया” में और अखबार “दैनिक दक्षिण  मुंबई” में स्तंभ लेखन प्रकाशित।
साक्षात्कार : ‘हस्तीमल हस्ती जी’ पर लिया गया साक्षात्कार मुंबई की ‘अनभै’ पत्रिका में प्रकाशित।
रेडिओ :- वेब रेडिओ ‘रेडिओ सिटी (Radio City)’ के कार्यक्रम ‘ओपेन माइक’ में कई बार काव्यपाठ एवं अमृतलाल नागरजी की व्यंग्य रचना का पाठ।
पता :- 34/603, एच॰ पी॰ नगर पूर्व, वासीनाका, चेंबूर, मुंबई – 400074.
फोन न॰:- 022 25543959, मो॰ न॰ – 09619209272.



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