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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

03 जून, 2018

मीडिया और समाज: एक




जनसंचार माध्यम: विभ्रम और यथार्थ

संजीव जैन



मित्रों,
आज से बिजूका पर एक और स्तम्भ की शुरुआत कर रहे हैं। कुछ बरसों से मीडिया और समाज में बहुत तेज़ी से बदलाव आ रहा है। यह बदलाव समाज के लिए कितना उचित है और कितना अनुचित है। इस  साप्ताहिक स्तम्भ: मीडिया और समाज। यही समझने की कोशिश होगी। इस स्तम्भ के  लेखक बिजूका  के साथी आलोचक, चिंतक प्रो संजीव जैन , होंगे। मीडिया और समाज में हो  रहे बदलाव और बदलाव की वजहों से अवगत हो सकेंगे। आज प्रस्तुत है पहली कड़ी: जनसंचार माध्यम: विभ्रम और यथार्थ
सत्यनारायण पटेल



जनसंचार माध्यम: विभ्रम और यथार्थ

संजीव जैन


तमाम जनसंचार माध्यम मानसिक रूग्णता के शिकार हैं, और वे मानसिक रूग्णता को ही एक खूबसूरत माल की तरह पैदा करते हैं, क्योंकि ये रूग्ण व्यवस्था के उत्पाद हैं, इसके मालिक और नियंत्रक बीमार मानसिकता के शिकार हैं। जनहित का एक पूरा मायालोक निर्मित करके जनता को उसके वास्तविक हितों से भ्रमित किया जाता है ताकि पूंजीवादी हितों का पोषण अनंतकाल तक होता रहे, अपने मालिकों के मुनाफे को पोषित करना ही इनका एक मात्र उद्देश्य है।


संजीव जैन


पूंजीवादी मीडिया वास्तव में क्या काम करता है? बुर्जुआ लोकतंत्र को जनशोषणकारी बनाये रखने में सूक्ष्म भूमिका निभाता है और जनता के बीच स्वयं को जनता की आवाज होने का भ्रम बनाये रखने का काम करता है। विशालपूँजी के स्वामित्व वाला मीडिया जानता है कि इस तथाकथित (बुर्जुआ वर्ग द्वारा कथित) लोकतंत्र को जिंदा रखने में ही उसकी और उसके आकाओं की भलाई है इसलिये वह आम जनता को उसकी पारंपरिक रूप से उदासीन और आज्ञापालक, अनुकरणमूलक, और भूलजाने वाली मानसिकता में बनाये रखता है। इस प्रक्रिया से जनता को राजनीतिक बहस और वास्तविक राजनीतिक गतिविधियों के दायरे से बाहर फेंक दिया जाता है। अलबत्ता जनता को राजनीतिक बहस में दिखते रहने का एक भ्रम यह मीडिया हमेशा बनाये रखता है इसके लिये वह कुछ बुर्जुआ और व्यवस्था के पक्षधर या व्यवस्था के वास्तविक चरित्र से अनजान लोगों को कभी कभी इस बहस में शामिल करता रहता है ताकि शेष जनता को यह महसूस होता रहे कि वह निष्क्रिय नहीं है। इस भ्रम बनाये रखने वाली जनभागीदारी से दूसरा महत्वपूर्ण काम वह यह करता है कि जनता के बीच जो वास्तविक क्रांतिकारी ताकतों, वैकल्पिक लोकतंत्र के पक्षधर और जनता के बीच वास्तविक रूप से सक्रिय जन नेताओं को व्यापक जनजीवन से बाहर करता है। उनके बारे में श्मशानी चुप्पी और उनके वास्तविक कार्यों को राजनीतिक बहस का मुद्दा नहीं बनने देती है।

मीडिया के इस चरित्र को इतने महीन तरीके से बुना गया है कि जनता तो इसके धोखे में आ ही जाती है, अधिकांश बुद्धिजीवी और व्यवस्था के विरोधी भी उसकी इस भूमिका को ठीक से नहीं समझ पाते हैं। वे सिर्फ मीडिया के बिके होने और भ्रष्ट होने को मुद्दा बनाये रखते हैं। इसमें भी वे मीडिया के चरित्र पर सवाल खड़े नहीं करते बल्कि कुछ मीडियाकर्मियों के भ्रष्टचरित्र को इसके लिये जिम्मेदार मानकर जनता को मीडिया के अलोकतांत्रिक जन विरोधी और सत्ता और शोषण समर्थक भूमिका को अदृश्य कर देते हैं। जैसा कि नॉम चॉम्स्की लिखते हैं - ‘‘संचार माध्यम राज्य और निगम सत्ता के हितों की सेवा करते हैं, जो परस्पर घनिष्ठतापूर्वक जूड़े हुए हैं। वे अपनी रिपोर्टिंग और विश्लेषण को इस तरीके से तैयार करते हैं, जिससे स्थापित विशेषाधिकार को बल मिल सके और बहसों तथा चर्चाओं को सीमित किया जा सके।’’1 1. जन माध्यमों का मायालोक, ग्रंथशिल्पी, पृ. 21

पूँजीवाद एक नियंत्रणकारी तंत्र है, जो दुनिया की हर वो चीज जो मुनाफा कमाने वाली हो उसको अपने नियंत्रण में बंधुआ बनाकर रखने के लिये ही सक्रिय रहता है, चूँकि इंसानों के बिना मूल्य पैदा नहीं किया जाता सकता इसलिये वह दुनिया के तमाम इंसानों को जिसमें पूँजीपति स्वयं भी शामिल है, बंधुआ मजदूर बनाकर अपने नियंत्रण में रखने के लिये हाड़तोड़ मेहनत कर रहा है। इस अर्थ में पूँजीवाद तमाम सामाजिक संबंधों को नियंत्रित करने की कार्यवाही और रणनीति है। जनसंचार माध्यमों के स्वरूप, कार्यप्रणाली, मालिकाना, तकनीक के उद्गम और विश्लेषण के द्वारा हम पूँजीवाद के इस नियंत्रणकारी स्वरूप को बहुत स्पष्टता से देख और खोल सकते हैं। पूँजीवाद का सार है मुनाफा कमाना। अपने इस साररूप को बनाये रखने और निरंतर बढ़ाने के लिये, उसे जरूरी होता है कि वह दुनिया की हर चीज (व्यक्ति, भावनायें, कामनायें, आकांक्षायें, अभिरूचियों, प्रवृत्तियों, आदतों, रिश्तों, और तमाम तरह की सेवाओं और वस्तुओं को) ‘माल’ बनाकर बाजार में विक्रय के लिये उपलब्ध कराये। चूँकि पदार्थों से मुनाफा कमाने की एक सीमा है, और उसके उत्पादन और विक्रय की भी सीमा है, पर मानवीय गुणों और प्रवृत्तियों से असीम मुनाफा कमाया जा सकता है। इसलिये वह जनसंचार माध्यमों के द्वारा मानवीय चेतना को बंधुआ बनाने के लिये निरंतर सक्रिय है। जनसंचार माध्यमों का अध्ययन इस केंद्र बिन्दु से किया जाना चाहिये।

जैसा कि आर्मंड मेतेलार्त ने लिखा है - ‘‘पूँजीवादी समाज में कोई भी रचनात्मक गतिविधियाँ माल का स्वरूप ले लेती हैं और वह बाजार में आदान-प्रदान के लिये चली जाती हैं। मानवीय गतिविधियों की परिणति भी माल के रूप में ही होती है। माल की परस्पर परिवर्तनीयता का यह तथ्य सभी उत्पादों और गतिविधियों पर लागू होता है: ‘पूँजीवादी उत्पादन प्रणाली के तहत चलने वाले समाजों में धन संपत्ति अपने आप को मालों के प्रचुर संचय के द्वारा परिभाषित करती है ....कोई भी माल कुछ भी होने से पहले एक बाह्य वस्तु होता है जो अपने गुणों के द्वारा मानवीय आवश्यकताओं को संतुष्ट करता है चाहे वह किसी भी प्रकार का हो। यह मानवीय आवश्यकतायें पेट से उपजी हुई हो सकती है या फिर कल्पनाओं की खुराक हो सकती हैंं।’’2 2. जनतंत्र जनमाध्यम और वर्तमान संकट, ग्रंथशिल्पी, पृ. 131

जनसंचार माध्यमों में इंसान एक वस्तु होता है, एक मशीन जिसका काम सूचना और संदेशों को प्राप्तकरना है जैसे ‘रिसीवर’ करता है। जनसंचार माध्यमों में जन एक रिसीवर है, उसकी कोई भूमिका इन सूचनाओं के पैदा होने से प्रेषित होने तक नहीं होती है। उसकी अभिरूचि या जरूरत का भी कोई ध्यान नहीं रखा जाता है। उसे एक निष्क्रिय प्राप्तकर्ता मानकर सूचना और संदेशों का लगातार प्रक्षेण किया जाता है। लगातार और तेज गति से प्रक्षेपित सूचनायें इतनी तात्कालिकता को लिये होती हैं, कि व्यक्ति जो पहले ही रिसीवर, या एक जड़ वस्तु बना दिया गया है, वह इन सूचनाओं को रिसीव तो करता है पर इन पर रूक कर सोचने और चयन करने के बारे में सक्रिय न हो सके। चयन करने का कोई अवसर या तकनीक जनसंचार माध्यमों ने नहीं दी है। हाँ चयन के भ्रम को अवश्य पैदा किया जाता है कि प्राप्तकर्ता अपनी मर्जी से सूचनायें ग्रहण कर सकता है, पर यह चयन का भ्रम भर होता है। तो जनसंचार माध्यमों की प्रक्रिया में इंसान एक वस्तु या निष्क्रिय इकाई भर होता है। जनसंचार माध्यमों में पाठक या स्रोता एक प्राप्तकर्ता होता है, वह सूचनाओं और कार्यक्रमों का उपभोक्ताभर है, जैसे बाजार की वस्तुओं के उत्पादन और वितरण में उसकी कोई नियंत्रणकारी भूमिका नहीं होती, वैसे ही सूचनाओं और कार्यक्रमों के उत्पादन और वितरण में उसकी कोई भूमिका नहीं होती। वह एक निष्क्रिय प्राप्तकर्ता है। तटस्थता का गुण दिखाया जाता है, वास्तव में तटस्थता एक संवाद के बीच की स्थिति होती है, संचार माध्यम तो संवादविहीन एक तरफा प्रसारण की प्रक्रिया है, इसलिये इन माध्यमों में जनता को एक वस्तु विवेकहीन और नियंत्रित वस्तु बनाकर रखा जाता है।

‘‘बार बार दोहराये जानी वाली प्रक्रिया और फितूर के माध्यम से परिचर्चाओं और कथानकों के स्वरूपों द्वारा इन्सान को वस्तुओं के दर्जे में रखा जाता है। उन्हें केवल प्राप्कर्ता, पाठक और स्रोता की तरह ही देखा जाता है। और इस प्रकार नाटक के विरोध के माध्यम से इस तंत्र के शिकंजे को और अधिक कस दिया जाता है।’’3. 3 वही पृ. 135

हमारे यहाँ साहित्यिक पत्रिकाओं का एक ढांचा बना हुआ है, उनका एक पाठक वर्ग भी निश्चित है, और पत्रिका की सामग्री का स्थान, लेखक वर्ग, कंटेट सब एक ढांचाबद्ध है, इसलिये यह बंद संचार माध्यम है। जिसमें वर्गीय विभाजन और वर्ग शोषण वर्ग संघर्ष की वास्तविकता छिप जाती हैं। और यह स्थिति अंततः पूंजीवादी व्यवस्था के हित में काम करती है। तमाम तरह की व्यवस्था की सतही आलोचना इन पत्रिकाओं का कंटेट होती है, इसका कोई भी असर वर्गीय चेतना जगाने में नहीं होता, बुद्धिजीवियों की सत्ता विरोध का उबाल यहाँ ठंडा हो जाता है, यह पूरी स्थिति सत्ता और पूँजी के हितों को बनाये रखती है। वैकल्पिक मीडिया के नाम पर चलने वाली यह गतिविधि सत्ता का विकल्प कभी खड़ा नहीं करती, व्यक्ति विरोध, पार्टी विरोध, भ्रष्टाचार और हिंसा का विरोध का तरीका इतना सतही और तात्कालिक स्वरूप वाला होता है कि उससे सत्ता के दमनचक्र का काम आसान हो जाता है अर्थात उसे दमनकिये बिना ही वैधता प्राप्त हो जाती है, जनता के बीच इन पत्रिकाओं का कोई भी रूप नहीं पहुँचता है, यह बात बुर्जुआ सत्ता और उत्पीड़क वर्ग जानती है इसलिये वह इनको अंदर ही अंदर प्रश्रय देते रहने की नीति अपनाती है। सरकारी सहायता, पुरस्कार, सरकारी यात्रायें, और कई अनेक रूपों में वह इन्हें सहायता देती है। यह पूरी स्थिति वैकल्पिक मीडिया के नाम पर चलने वाली साहित्यिक पत्रिकाओं को अपने अंदर समाहित करके अपने हितों के पोषण में उपयोग करने के  लिये अपनायी जाती है।

‘‘इस प्रकार के प्रत्येक प्रकार और ढांचे (जो तमाम मीडियाओं में प्रकट होते हैं) पाठक को विशेष तबके और वर्गीय भाषा से अलगाव में डाल देते हैं जो हकीकत के प्रति निर्दयी बना देती है। यह हम कह सकते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति झूठी दुनिया में जीने लगता है और ऐसी दुनिया में धकेलने के बाद पाठक को खेलों की दुनिया, जासूसों की दुनिया, और प्रेम की दुनिया की ओर धकेल दिया जाता है और इन्हें ऐसे व्यक्त किया जाता है मानो ये अपने आप में ही संपूर्ण हों और इनका एक दूसरे से कोई रिश्ता न हो। वे अपने रोजमर्रा के अनुभवों के बाहर खुलना शुरु होते हैं और इतिहास के हाशिये पर क्रियाशील होने के अपने स्वयं के नियम स्थापित करते हैं। ऐसे नियमों का पुलिंदा स्थापित कर दिया जाता है जो विश्व को समझने के सार्वभौमिक नियम बन जाते हैं, जैसे खेल पत्रिकाओं की भाषा, शासक वर्गों द्वारा खेल को चलाने की भाषा के रूप में स्थापित कर दी जाती है और उसके अभ्यास में उसे इस्तेमाल करना जरूरी हो जाता है और ज्यादा सरल शब्दों में उदाहरण के लिये यह विशेष भाषा ‘देह’ को दिये गये विशेष दर्जे को दर्शाती है और ‘अवकाश’ ‘दैहिक ताकत’ की वर्गीय अवधारण का प्रतिनिधित्व करती है।’’ जैसे ‘साफ दिमाग साफ शरीर’ यह आधिपत्य की शब्दावली है। वही पृ. 134

‘‘दूसरी तरफ महिलाओं की पत्रिकायें महिलाओं का नारीत्व के मिथक में बांधे हुए होती हैं। बेशक यह कितना ही आधुनिक लगे असल में वह उसे मुक्ति के अधिकार से वंचित रखती हैं और वे ये दिखावा करते हैं कि हम स्वतंत्रता को बढ़ावा दे रहे हैं। प्रेम पत्रिकायें पाठकों को दिल की बात सुनने के लिये उकसाती हैं। ये तमाम सांस्कृतिक उत्पादों फर्जी सत्ताविरोध को पैदा करते हैं, जो बड़े व्यवस्थित ढंग से मौजूदा सामाजिक संबंधों (आध्यात्मिक- भौतिक, काम करने- फुरसत, परंपरागत-आधुनिक, परिवार राजनीति) को बदलने की इच्छा को ही रोक देते हैं। हमें इस बारे में साफ होना चाहिये कि यह कोई विविधता नहीं है और न ही यहाँ कोई रूचियों की प्रचूरता का मामला है। ये तमाम चीजें अपने आप में शोषणकारी हैं,। ये सब एक वर्गीय रूझान ही है जो हकीकत को छिन्न-भिन्न करते हैं। ये सभी वे मान्यतायें हैं जिनको आधार बनाकर प्रत्येक पत्रिका और प्रत्येक टेलीविजन चैनल के कार्यक्रम संचालित होते हैं। यह विकृति है।’’ वही पृ. 134

संचार माध्यम प्रतीकों और आईकॉन को बनाते हैं, ये प्रतीक और आईकॉन मानव चेतना को नियंत्रित, दिग्भ्रिमित और अनुकरणमूलक बनाते हैं। ये प्रतीक और आईकॉन चूंकि मीडिया द्वारा बनाये गये होते हैं इसलिये अपनी सहज दिखनेवाली छवि के माध्यम से जनता के विद्रोहात्मक दृष्टिकोण को कुंठित करते हैं। ये व्यवस्था की तमाम विकृति और बर्बरता को ढंक लेते हैं और यह दिखाने का प्रयास करते हैं कि समाज में सब कुछ अच्छा है, शांतिपूर्ण है, कूल दिखना इनकी रणनीति होती है। ये प्रतीक और आईकॉन गंदगी के ऊपर रेशम की चादर की तरह तने रहकर जनचेतना को भ्रमित करते हैं। अगर हम बहुत ध्यान से परखें तो पायेंगे कि ये प्रतीक और आईकॉन जन चेतना को सर्वाधिक प्रभावित करते हैं। यह प्रभाव जनचेतना के उपभोक्ताकरण में और अविवेकीकरण करने में सर्वाधिक दिखाई देता है। मीडिया जो इन कामों को अंजाम देता है, वह लोकतांत्रिक नहीं लोक का अलोकतांत्रिकीकरण करता है। इसी स्थिति में हर तरह के अमानवीय और कू्ररतम कार्यों को अंजाम देते हुए भी सत्ता में लोग बने रहते हैं।

जन चेतना का अविवेकीकरण करके उसे अपनी वस्तुगत स्थितियों से परे रखने में मीडिया की सबसे सकारात्मक भूमिका होती है। आईपीएल जैसे बड़े कर्मकांड किसी न किसी रूप में मीडिया आयोजित करता रहता है। इसमें बड़ी पूंजी का बड़ा खेल स्टेडियम से बाहर चलता है और देश की ताकत यानी युवावर्ग पानी के अभाव में मरने और मर मर कर जीने की स्थितियों से अपरिचित एक उन्माद में व्यस्त रहता है। यह उन्माद अनेक तरीकों से मीडिया पैदा करता है। इस उन्माद के वातावरण में जनता की वास्तविक समस्यायें परिदृश्य से गायब रहती हैं। इन्हें गायब रखना ही मीडिया का सबसे महत्वपूर्ण काम होता है। जब तक मीडिया की इस अतंर्निहित भूमिका को नहीं समझा जायेगा तब तक इसके प्रतिगामी रूपों की वस्तुगत समझ विकसित नहीं होगी।
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 संजीव जैन का एक और लेख नीचे लिंक पर पढ़िए

समकालीन विश्व में महात्मा गाँधी की प्रासंगिकता
http://bizooka2009.blogspot.com/2018/05/522-httpbizooka2009.html

2 टिप्‍पणियां:

  1. बंधु, समुचित विश्लेषण के लिए बधाई! लेकिन, और यह महत्वपूर्ण लेकिन है, क्या आपको नहीं लगता कि वर्तमान भारतीय परिप्रेक्ष्य में निष्क्रिय विश्लेषण से अधिक की ज़रूरत है. लोगों को तत्काल विश्लेषण-युक्त सक्रिय दिशा देने का समय आ चुका है.

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  2. हार्दिक शुक्रिया दिनेश जी। इस लेख में जो छूट रहा है, उसे यदि आप आगे बढ़ाएं तो अच्छा होगा। इस विषय पर एक बेहतर समझ विकसित होगी। अपनी चाहे तो विस्तार से यही कह दीजिए या स्वतंत्र लेख दीजिए। प्राकाशित कर हमें ख़ुशी होगी। यह मंच संवाद के लिए ही है।

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