image

सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

23 जून, 2018


स्त्री चेतना और आदिवासी जनजातियां

डॉ. कविश्री जायसवाल





साहित्य समाज का दर्पण कहा जाता है ऐसा दर्पण जो समाज के हर क्षेत्र को दिखाये। और जब बात वैश्विक साहित्य की हो रही हो तब इसका विस्तारण अनंत हो जाता है। साहित्य
अपने अन्दर सम्पूर्ण भूमण्डलीकरण को समेटे हुए है। आज विश्वमंच पर अति आधुनिक से लेकर पिछडे़ और ढका छुपा साहित्य भी उजागर हो रहा है। आज साहित्यकार अपनी
रचनाओं में उन तथ्यों को हमारे सामने ला रहा है जहाँ आम आदमी को सोच नहीं जाती है।चूंकि हम इंसान है और जिज्ञासा हमारे अन्दर बसी हुई है। तो उसी जिज्ञासु प्रकृति के
अनुसार हम पिछड़ी आदिवासी जनजातियों को भी जानना चाहते हैं। आदिवासी समुदाय न केवल भारतीय अवधारणा में है अपितु यह विदेशी मानसिकता की भी उपज है क्योंकि वैश्विक स्तर पर ‘यूरोप’ के वाइकिंग, गोथ और वैडंल,

एशिया के स्काइथियन तथा मंगोल, संयुक्त राज्य अमेरिका के ‘नेटिव’ भी बेहद चतुर विनाशक और वर्चस्व के प्रतीक रहे। भारत के आदिवासी उड़ीसा, मध्यप्रदेश, छतीसगढ़, राजस्थान, गुजरात, आन्ध्रप्रदेश महाराष्द्र, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल में अल्पसंख्यक तथा पूर्वीत्तर राज्यों में बहुसंख्यक हैं।

पिछड़ी आदिवासी जनजातियों की अस्मिता की मुख्य अभिव्यक्ति की पहचान समाज में नारी चिन्तन को रूप प्रदान करने में निहित है। भले ही आदिवासी समाज वैश्विकरण के आइने में अपना रूप ग्रहण नही कर पाता लेकिन महिला सशक्तिकरण की नीति उन्हें एक दरजा ऊपर स्थान प्राप्त कराने में सक्षम है। इस संदर्भ में संस्कृत की यह उक्ति सार्थक है कि ‘‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता’’ अर्थात् जहाँ नारियों की पूजा होती है

है वहाँ देवता रमण करते है। यदि शेष भारत में नारियों के प्रति क्रांतिकारी बदलाव आधुनिक या फिर उत्तर आधुनिक समाज के देन है तो आदिवासी समाज में यह परम्परागत संस्कार के रूप में प्राप्त है। जहाँ एक तरफ आज इस भूमंडलीकरण के दौर में सांमती विचारधारा की धज्जियांँ उड़ती महिला लेखिकाएं है तो वहीं दूसरी तरफ ‘निर्मला पुतुल’ की यह कविता है जिसमें पुरूष मानसिकता की पोल खुल जाती है।

क्या हूँ मैं तुम्हारे लिए
एक तकिया
कि कही से थका-मांदा आया
और सिर टिका दिया
काई खूंटी
कि ऊब उदासी थकान से भरी
कमीज उतारकर टाँग दी
या आँगन में तनी अलगनी
कि घर-घर के कपड़े लाद दिये
काई घर
कि सुबह निकला
शाम लौट आया ?

अतः आदिवासी समाज का सकारात्मक पहलू नारी विचारो में दृष्टिगत होता है क्योंकि नारियों के प्रति उनका दृष्टिकोण समाज एवं संस्कृति में स्थान निर्धारित करते हुए वैश्विक स्तर पर टक्कर लेने के लिए पर्याप्त है।

आदिवासी साहित्य को हम देखगें तो पायेगें कि स्त्रियों ने अपनी बड़ी तदाद में उपस्थिति दर्ज कराई है। आदिवासी समाज में खेती का कार्य हो श्रम , शिकार दो या लड़ाई की बात हो हर समय स्त्री ने पुरूषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर उपस्थिति दी। इसी कारण आदिवासी साहित्य में स्त्री के बहुत से सवालों को महत्व मिला है। आदिवासी स्त्रियों ने पहले से अपने हक और अधिकारों के लिए पुरूषों के साथ मिलकर समाज और शासकों का सामना किया है समय-समय पर उसने अपने हाथ में हथियार भी उठा लिए हैं। कवयित्री ‘निर्मल पुतुल’ ने अपनी कविताओं द्वारा स्त्री अस्मिता प्रश्नों को हाशिए पर ढकेल अपनी पीड़ा का प्रतिरोध करती हुयी चेतावनी देती हैं वह कहती है -

आज की तारीख के साथ

की गिरेंगी जितनी बूंदे लहू की पृथ्वी पर

उतनी ही जनमेगीं ‘निर्मल पुतुल’

हवा में उठ्ठी-बधे हाथ लहराते हुए।2


जिस प्रकार प्रायः अन्य समाजों में स्त्री को सृजन और सौंदर्य का प्रतीक माना गया है वैसे ही आदिवासी समाजो में भी स्त्री प्राकृतिक सौंदर्य और सृजन शक्ति का स्रोत रही हैं। मातृसत्तात्मक आदिवासी संस्कृति में तो स्त्री पुरूष से भी ज्यादा महत्व पाती हैं।


डॉ. मंजू ज्योत्स्ना ने ‘ब्याह ’ कविता के माध्यम से एक आदिवासी

स्त्री को अपने माता-पिता का घर छोड़ दूसरे के घर जाने के बाद की पीड़ा को व्यक्त करती है ससुराल में लड़कियों के साथ शोषण, अत्याचार, दहेज के लिए जलाना खेत और घर को संभालना और यह सब बुधनी, मंजरी, सोमरी जैसी पीड़ित सहेलियों के उदाहरण देखे हैं। वह ऐसे पुरूष जाति का विरोध करती है जो स्त्री को सिर्फ ‘चूल्हा और बिस्तर ’ के माफिक समझता है। वह कहती है -

पिता मेरी शादी मत करना

मैंने देखी है बुधनी की जिंदगी

बाल बच्चे संभाल खेत में खटती है

उसका मर्द सांझ, सवेरे, रात

मारता है कितना’’3

आदिवासी संस्कृति में वर चुनने को स्वतंत्रता है इसमें वह न तो दंडित होती है और न ही दोषी करार दी जाती है उनके यहाँ प्रचलित ‘घोटलू प्रथा’ में वैदिक संस्कृति की तरह एक प्रकार के प्रशिक्षण प्राप्त करते हैं। यह बहुत कुछ पूर्वाग्रह की तरह काम करता है। इसलिए भारत की अन्य स्त्रियों के विपरीत आदिवासी लड़कियां स्वतंत्रातापूर्वक अपनी रजामंदी से विवाह करती है इस प्रथा में उनका प्रणय निवेदन प्रमुख है। इनका प्रमाण हमें पूर्वोत्तर राज्य मिजोरम के दक्षिण-पश्चिम सिरे पर निवास करने वाले ‘चकमा’ के प्रणय गीतो से मिल जाता

है। ‘चकमा’ बौद्ध होते है और ये मंगोल प्रजाति के आदिवासी है। उनका यह प्रणय गीत इस कथन को सिद्ध करने में सहायक हैं -

नदी नाले और ताल तलैया भर जाने से जैसे

मछलियाँ खुशी से नाच उठती है,

मेरी सजनी

वैसे ही तेरे हाथ से पान खाकर मेरा दिल नाचने लगता है।

जैसे पहाड़ी झरनों में मछलियां खरपतवार के बिना जिंदा नहीं रह

सकती

ओ मेरे प्रिय।

वैसे ही तुझे देखे बिना में एक पल भी जिंदा नहीं रह सकता।4


आदिवासी महिलाओं का ऊपरी आवरण भले ही श्याम रंग का हो परन्तु भीतर से वो बहुत

उज्ज्वल है भोली है, छोटी -छोटी बातों में वो अपने लिए मनोरंजन और खुशी ढूंढ लेती है।
उनकी सोच में उनके अपनो में उनकी गाय, बकरी, और सूअर तक भी आते हैं। अन्य समाजों
की तरह आदिवासी समाज भी महिलाओं और पुरूषों की सहभागिता से बना है लेकिन इसमें

जो सबसे बड़ी बात है वह आदिवासी समाज की संरचना में महिलाओं का पुरूषों से चौगुना योगदान है औरते आदिवासी समाज की अर्थव्यवस्था की रीढ़ होती है। उन्हें खेत, जंगल, पहाड़ में ही नही हाट बाजारो में भी मेहनत मजदूरी करते हुए देखा जा सकता है, रोज मीलो पैदल चल कर पानी भी लाती है और नशे में धुत लड़खड़ाते मर्दो को कंधो का सहारा भी देती है भूख, प्यास , थकान से पस्त स्त्री पुरूषों के रोज लात घूसे भी सहती है और देर रात गये देह पर पाश्विक तांडव भी । सब कुछ सुनती है मन ही मन गुनती किन्तु बात जब अपने अस्तित्व की हो तो वो अपने हक के लिए खड़ी भी होती हैं।

श्री पुन्नी सिंह के आदिवासी उपन्यास ‘सहराना’ की नायिका चंपा अपने पति ‘सोमा’ से अपने हक के लिए लडती है गिड गिड़ाती नही वह कहती ‘तू मरद है, एक नई चार बय्यर रख सकता है।5

लेखक की चंपा के द्वारा पुरूष जाति पर अद्भुत व्यंग्य कराया है। शिलांग में ‘खासी’ जनजाति का प्रभाव है वह स्त्री प्रधान प्रदेश है जबकि भारत एक पुरूष प्रधान देश है। मेघालय की यह ‘खासी’ जनजाति स्त्री प्रधान है। परिवार की मुखिया स्त्री होती है। और उसी की जाति के नाम से वंश चलता है यहाँ पुरूष मात्र घर के सदस्य की तरह होता है जो शादी के बाद पत्नी के घर में जाकर रहता है। उसे सारे नियम कानून पत्नी के परिवार के ही मानने पड़ते है पुरूष कम ही काम करते है ज्यादातर नौकरी या व्यवसाय स्त्रियां ही संभालती है। और घर संभालना भी उन्ही की जिम्मेदारी है।

खासी समुदाय में बहुपति विवाह भी मान्य होते है। विवाह पूर्व किसी लड़की का गर्भवती होना भी कोई समस्या नहीं है अविवाहित लड़की की संतान भी उसी प्रकार स्वीकार्य है जिस प्रकार विवाहित की। यहाँ तक बलात्कार की पीड़ित लड़की भी गर्भ धारण कर लेती है तो उसे भी भगवान के प्रसाद के रूप में स्वीकार कर लिया जाता है। एक स्त्री कई पुरूषों के साथ सम्बन्ध बना सकती है। श्री प्रकाश मिश्र के उपन्यास ‘रूपतिल्ली’ की कथा में भी अल्खा, आवरी, तिरीत सिंह की मां आदि ऐसी ही स्त्री पात्रों के उदाहरण है।

आदिवासियों के विद्रोह में स्त्रियों के कार्य को हम कैसे भूल सकते हैं। ‘सिनगी दई’ जैसी वीर योद्धा मुगल सेना के साथ मैदान में अकेले ही लड़ती है।

‘ग्रेस कुजुर’ अपनी कविता के माध्यम से सिनगी दई की याद करते हुए उनकी अनुपस्थिति को व्यक्त करती हैं आज आदिवासी कविताओं में नवजागरण के भांति स्त्री चेतना से युक्त आदिवासी समाज के आक्रोश एवं अस्तित्व-साकार के स्वर सुनाई देते हैं -

अगर अब भी तुम्हारे हाथो की

उगंलियाँ थरथराई तो जान लो

मैं बनूँगी एक बार और सिनगी दई।6


राजस्थान में पाई जाने वाली ‘कालबेलिया’ जनजाति की गुलाबो नाम की महिला जो कि जानी मानी ‘लोकनृत्यागंना है विश्व के सबसे बड़े मंच संयुक्त राष्द्र संध में अतिथियों के मनोरंजन

के लिए राजस्थानी लोक संस्कृति की झलक दिखा के जब वे लौटती है तो उन्हें अपनी प्रस्तुति का पारिश्रमिक नहीं मिलता तो उन्हे भी मुख्यमंत्री आवास पर धरने पर बैठना पड़ा। तब जाकर उनकी मांगे सुनी गई। यह बड़ी सोचनीय बात है यदि ऐसा होता रहा तो आदिवासी स्त्रियो का भी अपनी मूल संस्कृति से बिछुड़ने की शुरूआत होती चली जायेगी। क्यों? इसलिए कि वह आदिवासी नारी है।

वर्तमान में जहाँ आज पूरे समाज में कोई भी शादी पार्टियां होती है तो लोग शराब पिये बिना नहीं रहते वहीं आदिवासी समुदाय में विवाह आदि के समय शराब पीकर आने वाले लोगों को वहाँ की आदिवासी स्त्रियां शराब से होने वाली हानि को व्यंग्यात्मक ढ़ग से अपने लोकगीतो में गाती हैं।
‘‘धोड़ी-धोड़ी बोतल दुबा राखी दारू

पीबंगा रै बड़ की छाया में कैद भिलाई म्हारी हो जावै।’’

इन पंक्तियों के माध्यम से ‘करौली जिले की तहसील नादौती ग्राम रायसना माड़ क्षेत्र की

आदिवासी महिलाये शराब पीने वाले अतिथियों  की व्यंग्यात्मक लोकगीत गाकर शराब से होने
वाल दुष्परिणामों को याद दिलाती है। इस तरह आदिवासी महिलायें संस्कृति और परंपराओं
को ध्यान में रखते हुए पुरूषों को संयत करती रहती है। इसलिए यह क्षेत्र शराब का सेवन
करने वालो क्षेत्रो से अछूता क्षेत्र माना जाता है।
इस प्रकार हम कह सकते है कि आदिवासी महिलाओं द्वारा गाये जाने

वाले लोकगीतो में भी बहुत बड़ा रहस्य छिपा होता है। यदि इनको समझा जाये तो ये वैश्विक साहित्य के लिए जड़ी बूटी साबित हो सकता है।

आदिवासी साहित्य में नारी विमर्श को प्रमुखता से महत्व प्रदान करके पीड़ा को क्रांतिकारी स्वरूप देकर व्यक्त करने वाली कवयित्रियों में निर्मला जी के अतिरिक्त ‘खडिया भाषा’ की वंदना टेटें का सफलतम प्रयास भी सराहनीय है। वंदना टेटे ने न केवल नारी आंदोलन के माध्यम से मुक्ति की कामना की है। अपितु सामुदायिक विकास कार्यक्रमों के माध्यम से भी आदिवासी संस्कृति को पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।

‘औरत’ नाम से हिन्दी में अनुवादित कविता इन्ही मानसिकताओं की पोल खोलती नजर आ रही है और औरतो की पुरूषों के विरूद्ध संघर्ष हेतु मोर्चा का आवाह्न करती है।

कई-कई मोर्चे पर खड़ी

लड़ रही औरत

भीड़ में अकेली, अनवरत् थकती टूटती

फिर मजबूर करती खुद को खुद से

खेतो, खलिहानो में

जंगल मरूभूमि में

घर में आंगन में

तुम्हारी खोयी लक्ष्मण रेखा

के खिलाफ

उसने बो दिये है संघर्ष बीज

और पिरो दिये है मधुगीत

हताश होती और उलाहाने देती

तुम्हारी नफरत भरी आवाज को

बना लिया है

उसने अपनी ताकत।7


इस प्रकार स्त्री सशक्तिकरण को बल तभी मिलेगा जब परिस्थितिवश इस दृष्टि से परखते हुए उनकी संवेदनाओं की सम्पूर्ण वैश्विक साहित्य के परिवेश व्याप्त करायेगें। इस मुद्दे पर परम्परा, संस्कृति और समाज के भीतर पुरूष समाज से जिरह करते हुए समाजवादी विचारक ‘लोहिया’ के विचार उन आदिवासी नारियों के ह्दय की पीड़ा को कम करने मेंसक्षम है क्योंकि उन्होंने समा को अगाह करते हुए कहा था कि किसको पंसद करोगे , ऐसी औरत पंसद करोगे जो आपके प्रति अपना प्रेम, अपनी भक्ति, अपना आदर आपके मरने के बाद आपके शरीर के साथ या शरीर के बिना जलकर दिखाये या ऐसी औरत पंसद करोगे, जो आपके साथ-साथ

या आगे-पीछे देश की रक्षा करते हुए खुद अलग से मरे ?..................... नारी को गठरी नही बनाना है परन्तु नारी को इतना स्वयं काबिल होना चाहिये कि वक्त पर पुरूष को गठरी बनाकर अपने साथ ले जा सके।

निर्मला पुतुल


हम भूमंडलीकरण के दौर में एक तरफ भारतीय संस्कृति की वैश्विक पहचान बनाने में स्त्रियां अगल पंक्ति में शामिल होने को तत्पर है। वहीं दूसरी तरफ न केवल भारत अपितु विश्वस्तर पर ये जनजातियां अपने विकास और सर्वहितकारी स्वरूप को प्राप्त करने के लिए विवश है। और इस समाज में नारी की संवेदनायें पीड़ित और स्वतंत्रता की तलाश में व्याकुल है। हो सकता है निकट भविष्य में स्त्री सशक्तिकरण में एक ऐसी क्रांति आये जिससे सामाजिक समरसत्ता कायम हो। इसलिए आज का आदिवासी विमर्श अस्तित्व और अस्मिता का विमर्श है। चूंकि आदिवासी समाज में श्रम में भागदारी के कारण स्त्री औरो से बेहतर स्थिति में रही है इसलिए वैश्विक साहित्य में भी बड़ी संख्या में स्त्री रचनाकारों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। उनके और अन्य रचनाकारों के माध्यम से आदिवासी साहित्य में स्त्री के सवालों को पर्याप्त जगह मिल रही है। हिंदी अधिकांश आदिवासियों का भाषा नहीं हैं। मुंडारी, संथाली , हो, भीलोरी, ओड़िया, गारो आदि उनकी भाषाएं है। हिंदी में मौजूद साहित्य देशज भाषाओं में उपस्थित साहित्य की इसी समृद्ध परंपरा से प्रभावित है। कुछ साहित्य का अनुवाद और रूपान्तरण भी हुआ है। भारत का तमाम आदिवासी भाषाओं में लिखा जा रहा साहित्य हिन्दी, बांग्ला, तमिल, के साथ-साथ अंग्रेजी, फ्रेंच, जर्मन आदि बड़ी भाषाओं में अनूदित और रूपांतरित होकर एक वैश्विक स्वरूप की ग्रहण कर रहा है। आदिवासी साहित्य के प्रति पत्रिकाओं प्रकाशकों और सबसे ज्यादा पाठको का बढ़ता रूझान इस बात के लिए आशान्वित करता है कि आदिवासी समाज में स्त्री की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जायेगी।
००

संदर्भ ग्रंथ:

1. साहित्य अमृत, संपादक त्रिलोकीनाथ चतुर्वेदी मई र् 2011 पृष्ठ 66
2. नगाडे की तरह बजते शब्द-निर्मला पुतुल,ु प्रकाशक भारतीय ज्ञानपीठ, पृष्ठृ 91, सं0ं 2005
3. आदिवासी स्वर औरै नयी शताब्दी - सं0ं रमणिका गुप्ता वाणी प्रका. संस्करण 2008,
पृष्ठृ सं-98ं
4. बहुवचन अंक जून 2010 पृष्ठृ - 97
5. सहराना उपन्यास लेखक पुन्नी सिंह पृष्ठृ - 146
6. आदिवासी स्वर और नयी शताब्दी - सं0ं. रमणिका गुप्ता वाणी प्रकाशन सं0ं 2008 पृष्ठृ
सं.-23ं
7. बहुवचन अंक जून 2010 पृष्ठृ सं.- 110

कविश्री जायसवाल का एक लेख और पढ़िए

बलात्कार: स्त्री और समाज
http://bizooka2009.blogspot.com/2018/04/blog-post_43.html


डॉ. कविश्री जायसवाल

असि. प्रोफेसर (हिन्दी)

एन. ए.एस. कॉलेज,मेरठ,

मो. 9412365513

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें