image

सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

20 मई, 2018

फरीद ख़ान की कविताएं 




फरीद ख़ान




माफ़ी  

सबसे पहले मैं माफ़ी मांगता हूँ हज़रत हौव्वा से.
मैंने ही अफ़वाह उड़ाई थी कि उस ने आदम को बहकाया था
और उसके मासिक धर्म की पीड़ा उसके गुनाहों की सज़ा है जो रहेगी सृष्टि के अंत तक.
मैंने ही बोये थे बलात्कार के सबसे प्राचीनतम बीज.

मैं माफ़ी माँगता हूँ उन तमाम औरतों से
जिन्हें मैंने पाप योनी में जन्मा हुआ घोषित करके
अज्ञान की कोठरी में धकेल दिया
और धरती पर कब्ज़ा कर लिया
और राजा बन बैठा. और वज़ीर बन बैठा. और द्वारपाल बन बैठा.
मेरी ही शिक्षा थी यह बताने की कि औरतें रहस्य होती हैं
ताकि कोई उन्हें समझने की कभी कोशिश भी न करे.
कभी कोशिश करे भी तो डरे, उनमें उसे चुड़ैल दिखे.

मैं माफ़ी मांगता हूँ उन तमाम राह चलते उठा ली गईं औरतें से
जो उठा कर ठूंस दी गईं हरम में.
मैं माफ़ी मांगता हूँ उन औरतों से जिन्हें मैंने मजबूर किया सती होने के लिए.
मैंने ही गढ़े थे वे पाठ कि द्रौपदी के कारण ही हुई थी महाभारत.
ताकि दुनिया के सारे मर्द एक होकर घोड़ों से रौंद दें उन्हें
जैसे रौंदी है मैंने धरती.

मैं माफ़ी मांगता हूँ उन आदिवासी औरतों से भी
जिनकी योनी में हमारे राष्ट्र भक्त सिपाहियों ने घुसेड़ दी थी बन्दूकें.
वह मेरा ही आदेश था.
मुझे ही जंगल पर कब्ज़ा करना था. औरतों के जंगल पर.
उनकी उत्पादकता को मुझे ही करना था नियंत्रित.

मैं माफ़ी मांगता हूँ निर्भया से.
मैंने ही बता रखा था कि देर रात घूमने वाली लड़की बदचलन होती है
और किसी लड़के के साथ घूमने वाली लड़की तो निहायत ही बदचलन होती है.
वह लोहे की सरिया मेरी ही थी. मेरी संस्कृति की सरिया.

मैं माफ़ी मांगता हूँ आसिफ़ा से.
जितनी भी आसिफ़ा हैं इस देश में उन सबसे माफ़ी मांगता हूँ.
जितने भी उन्नाव हैं इस देश में,
जितने भी सासाराम हैं इस देश में,
उन सबसे माफ़ी मांगता हूँ.

मैं माफ़ी मांगता हूँ अपने शब्दों और अपनी उन मुस्कुराहटों के लिए
जो औरतों का उपहास करते थे.
मैं माफ़ी मांगता हूँ अपनी माँ को जाहिल समझने के लिए.
बहन पर बंदिश लगाने के लिए. पत्नी का मज़ाक उड़ाने के लिए.

मैं माफ़ी चाहता हूँ उन लड़कों को दरिंदा बनाने के लिए,
मेरी बेटी जिनके लिए मांस का निवाला है.

मैंने रची है अन्याय की पराकाष्ठा.
मैंने रचा है अल्लाह और ईश्वर का भ्रम.
अब औरतों को रचना होगा इन सबसे मुक्ति का सैलाब.










आओ मिल कर बद्दुआ करें. 

दुनिया का कोई क़ानून बद्दुआओं के लिए किसी को रोक नहीं सकता.
इसलिए आओ सब मिल कर बद्दुआ करें कि
इस व्यवस्था के पोषकों को कीड़े पड़ें.
आओ उनकी जड़ों में मट्ठा डालें.

जिस संसद, अदालत, और प्रशासन को नहीं दीखते आँसू उन्हें आंसुओं में बहा दें.
हमारी अदालत उन सबको मुजरिम करार देती है.
उन सबका पुतला बना कर थूक दें उन पर.
या घरती पर उनके चित्र बनाकर रौंद डालें.
दुनिया का कोई क़ानून कुछ नहीं कर पाएगा.

भले हम बोल न पाएँ, लेकिन सपना तो देख ही सकते हैं.
दुनिया में कोई भी सपना देखने से नहीं रोक पाएगा.
इसलिए जो कुछ भी अच्छा है उसका मिल कर सपना देखें.
और सपना नींद में न देखें इस बात का ख़याल रहे.
दुनिया का कोई भी क़ानून खुली आँखों से सपना देखने से नहीं रोक पाएगा.

तो आओ मिल कर बद्दुआ करें उस व्यवस्था के लिए
जिन्हें लक्ष्मणपुर बाथे नरसंहार का कोई दोषी नहीं मिलता.
जिन्हें हत्यारे नहीं मिलते रोहित वेमुला के.
जिन्हें बलात्कारी नहीं मिलते मणिपुर के.
जिन्होंने सोनी सोरी की योनी में ठूंस दिए थे पत्थर
उनके लिए बद्दुआ करें.
हमने उस क़ानून को कभी नहीं तोड़ा जो हमारे दमन के काम आते हैं.
लेकिन आओ ग़ुस्से से देखे उन्हें.
दुनिया का कोई क़ानून ग़ुस्से से देखने पर हमें रोक नहीं सकता.

मन ही मन बना डालते हैं एक देश किसी को पता भी नहीं चलेगा.
और मन में कोई देश बनाना क़ानून का उल्लंघन भी नहीं है.
मन ही मन दोषियों को सज़ा देना भी क़ानून का उल्लंघन नहीं है.
और अदालत को पता भी नहीं चलेगा कि उनके छोड़े हुओं को हमने सज़ा दे डाली है.

जिन्हें नहीं सुनाई देता चीत्कार उनके सामने रोने की ज़रुरत नहीं है.
बम हम फोड़ नहीं सकते क्योंकि क़ानून का उल्लंघन हम कर नहीं सकते.
पर हमारे वश में जो है. वह तो हम कर ही सकते हैं.




खुदा


मैं तो तुम्हारा पीछा करते हुए ही दुनिया में आया था
और पीछा करते हुए ही चला जाऊँगा.
मेरे सारे कौतुक तुम्हारे लिए ही थे.
मेरा हर बहुरूप तुम्हारे लिए ही था.
सरकती पैंट और बहती नाक के समय से लेकर
बढ़ती तोंद और झूलती झुर्रियों के समय तक
मेरे सारे कार्य व्यापार तुम्हारे लिए ही थे.
तुम हो कि रौशनी में, रंगों में, सुगंधों में मिलते हो.





सपनों की लाशें 

शायद हम एक ऐसी दुनिया से विदा लेंगे जहाँ,
कातिल ख़ुद से ही बरी कर लेता है ख़ुद को.
जज ख़ुद को ही बर्ख़ास्त कर लेता है.
धमाके ख़ुद ही हो जाते हैं और लोग उनमें ख़ुद ही मर जाते हैं.
लड़कियाँ ख़ुद ही बलात्कार कर लेती हैं.
जाँच ख़ुद ही बदल जाया करती हैं.
फाँसी का फंदा ख़ुद ही बन जाता है.
किसानों और लड़कियों में ख़ुद ही होड़ मच जाती है
कि मरने में किसकी संख्या ज़्यादा होगी.

पैसे ख़ुद ही लुट जाते हैं. देश ख़ुद ही बर्बाद हो जाता है.
दलित ख़ुद ही अछूत हो जाते हैं.
बुरका ख़ुद ही पड़ जाता है औरतों की अक्ल पे.

किसी ने नहीं मारा नरेंद्र दाभोलकर को, गोविन्द पानसारे को,
एम एम कलबुर्गी को, गौरी लंकेश को.
सत्य की बात करने वालों ने जंभाई लेते हुए एक दिन सोचा
कि अब मर जाते हैं और मर गए.

कोई भी ज़िंदा नागरिक ख़ुद कुछ नहीं कर रहा हमारे देश में.
नदी की सतह पर ख़ुद बख़ुद तैर रही हैं देश के सपनों की लाशें.









तोड़ने दो. 

वे मजबूर हैं अपनी खिसियाहट से.
अगर विचार की कोई मूर्ति बन पाती तो वे उसे तोड़ते.
गाँधी को क्यों मारते ?
क्यों तोड़ते वे बुद्ध की प्रतिमा को बामियान में,
अगर समता की कोई मूर्ति बन पाती तो.

या वे भगत सिंह को फांसी पर क्यों चढ़ाते,
उस क्रांति को फाँसी पर न लटका देते
जिसका सपना उसकी आँखों में था ?

वे क्यों तोड़ते मंदिरों को, मस्जिदों को ?
उन्हें नहीं तोड़ना पड़ता अम्बेदकर की मूर्ति को
अगर संविधान की कोई मूर्ति बन पाती तो.

देवियो सज्जनो, सदियों से झुंझलाए लोगों पर तरस खाओ.
जब उन्हें भूख लगेगी तब करेंगे बात.







प्रधानमंत्री जी ! 

अगर यह भी तय हो जाए कि अब से मूर्तियाँ ही तोड़ी जाएँगी दंगों में.
तो मैं इस तोड़ फोड़ का समर्थन करूँगा.
कम से कम कोई औरत बच तो जाएगी बलात्कार से.
नहीं चीरा जाएगा किसी गर्भवती का पेट.

मैं तो कहता हूँ कि मूर्ति तोड़ने वालों को सरकार द्वारा वज़ीफ़ा भी दिया जाए.
कम से कम कोई सिर्फ़ इसलिए मरने से तो बच जाएगा
कि दंगाईयों के धर्म से उनका धर्म मेल नहीं खाता.

इसे रोज़गार की तरह देखा जाना चाहिए.
कम से कम सभी धर्म के लोग सामान रूप से जुड़ तो पाएंगे इस राष्ट्रीय उत्सव में.
तब किसी दलित पर किसी की नज़र नहीं पड़ेगी
और ऐसे में कोई दलित बिना किसी बाधा के मूँछ भी रख पाएगा
और घोड़ी पर भी चढ़ पाएगा.

प्रधानमंत्री जी, वैसे तो आप जनता की बात सुनते नहीं हैं.
पर यकीन मानिए मैं मुकेश अंबानी बोल रहा हूँ.



परिचय 

 पटना में पले बढ़े. उर्दू साहित्य में एम ए.
 तकरीबन बारह सालों तक पटना इप्टा के साथ जुड़ कर रंगकर्म.
 लखनऊ के भारतेंदु नाट्य अकादमी से नाट्य कला में दो वर्षीय प्रशिक्षण.
 पिछले कई वर्षों से मुम्बई में फ़िल्म और टीवी के लिए व्यवसायिक लेखन.
 संपर्क - kfaridbaba@gmail.com
☝🏼

1 टिप्पणी:

  1. आदरणीय / आदरणीया आपके द्वारा 'सृजित' रचना ''लोकतंत्र'' संवाद मंच पर 'सोमवार' २१ मई २०१८ को साप्ताहिक 'सोमवारीय' अंक में लिंक की गई है। आमंत्रण में आपको 'लोकतंत्र' संवाद मंच की ओर से शुभकामनाएं और टिप्पणी दोनों समाहित हैं। अतः आप सादर आमंत्रित हैं। धन्यवाद "एकलव्य" https://loktantrasanvad.blogspot.in/



    टीपें : अब "लोकतंत्र" संवाद मंच प्रत्येक 'सोमवार, सप्ताहभर की श्रेष्ठ रचनाओं के साथ आप सभी के समक्ष उपस्थित होगा। रचनाओं के लिंक्स सप्ताहभर मुख्य पृष्ठ पर वाचन हेतु उपलब्ध रहेंगे।

    निमंत्रण

    विशेष : 'सोमवार' २१ मई २०१८ को 'लोकतंत्र' संवाद मंच अपने साप्ताहिक सोमवारीय अंक के लेखक परिचय श्रृंखला में आपका परिचय आदरणीय गोपेश मोहन जैसवाल जी से करवाने जा रहा है। अतः 'लोकतंत्र' संवाद मंच आप सभी का स्वागत करता है। धन्यवाद "एकलव्य" https://loktantrasanvad.blogspot.in/

    उत्तर देंहटाएं