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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

08 मई, 2018

वर्तमान पत्रकारिता और अल्टरनेटिव मीडिया की भूमिका

वल्लभ

पत्रकारिता, खासकर टीवी पत्रकारिता आज ऐसे दौर से गुज़र रही है जिसकी कल्पना किसी ने भी नहीं की थी। किसने सोचा था कि एक दिन न्यूज़ चैनलों का एक ऐसा विशाल बाज़ार अचानक उठ खड़ा होगा। एक अबूझ दुनिया जिसमें सिर्फ और सिर्फ मनोरंजन के लिए जगह होगी। पत्रकारिता एंकरिंग में बदल जाएगी।खबरों में गैरजिम्मेदारी बढ़ेगी , संपादक नाम की संस्था पर राजनीतिक दल हावी हो जाएंगे, हर खबर को टीआरपी के पैमाने पर नापा जाएगा और टीआरपी बाज़ार की पैदाइश है। ये वो मसले हैं या कहें कि आरोप हैं जो आज की पत्रकारिता को कटघरे में खड़ा कर देते हैं।

वल्लभ 

भारतीय दर्शकों में सिनेमा की समझ तो बढ़ी है लेकिन न्यूज़ के लिए समझ पैदा होना अभी भी बाकी है। उसे अच्छे बुरे सिनेमा का फर्क पता है लेकिन गैर जिम्मेदार और झूठी खबरों तथा जिम्मेदार और महत्वपूर्ण खबरों में फर्क करना उसे नहीं आता। सवाल विश्वसनीयता और संवेदना का है। खबरों के मामले में दर्शक और पाठक में विशेष फर्क नहीं है। दर्शक चैनल बदलता है पाठक पन्ने पलटता है। आउटलुक और इंडिया टुडे जैसी पत्रिकाएं सेक्स सर्वे जैसे विषयों को पकड़ती हैं और टीवी वाले चैनल सनसनी फैलाने वाले विषयों को। इनसब के माध्यम से जनता के वो प्रश्न जो सत्ता तक आसानी से पहुंचाये जा सकते थे, उनकी भ्रूण हत्या कर दी जाती है। पत्रकारिता का मूल स्वभाव जनता के विचारों को मीडिया ट्रायल्स द्वारा प्रभावित करना नहीं बल्कि उन विचारों और प्रश्नों को सामने लाना है पूरी संवेदनशीलता के साथ। आज के समय में मीडिया को लेकर हमेशा ये आशंका बनी रहती है कि सरसरी तौर पर वह अपनी प्रस्तुति के माध्यम से भीड़ को उत्तेजित कर सकती है।

      खबरें दिखाना और खबरें बनाना अलग अलग बातें हैं।आज की पत्रकारिता के भीतर कंटेंट को लेकर जो समस्याएं हैं वो उभर कर सामने आ रही हैं। कंटेट हमेशा ही समय के सापेक्ष रहे और समय के मूल्यों के साथ पत्रकारिता चले तो ही इस स्तम्भ की मर्यादा और प्रासंगिकता बनी रहेगी। 'बाईट जर्नलिज़्म' का परसेप्शन पारदर्शिता के साथ आये तो ही बेहतर है। लोकसभा और राज्यसभा जैसे सरकारी चैनलों पर विजुअल्स को देखकर सत्ता की गंध को महसूस किया जा सकता है। ऐसी स्थिति में रेगुलेटरी बॉडी का कोई औचित्य नहीं रह जाता। कमोबेश तमाम खबरिया मंडी गलाकाट प्रतिस्पर्धा से जूझ रही है। पत्रकार बनाने वाली दुकानें भी बाज़ार में हैं। जे पी आंदोलन के पहले और बाद की पत्रकारिता का स्वरूपों की अगर हम शिनाख्त करें तो पता चलता है कि जिस तंत्र को निष्पक्ष होना चाहिए था वो आज पक्षधरता पर आश्रित है। ऐसी परतंत्रता में हमें इस स्तम्भ से जवाबदेही की उम्मीद भी नहीं रखनी चाहिए। लेकिन सवाल तो कायम है कि इस तंत्र को बचाया कैसे जाय? अल्टरनेटिव विकल्प क्या हो? कैसे कैमरे और कलम को एक्टिविस्ट वेपन होने से बचाया जाए?

इस प्रयास में विकल्प के तौर पर सोशल मीडिया अपने लिमिट कॉमनसेंस के साथ आगे आयी। लेकिन कुछ ही सालों में इसकी इंटीग्रेटेड कांशसनेस की कमी खुलकर सामने आने लगी। विकल्प के तौर पर ये माध्यम सशक्त हो सकता था लेकिन कद्दावर चालाकों ने इसका दूसरे तरह से उपयोग करना शुरू कर दिया।फीचर टाइप और प्राइम टाइप आइटम को आई टी सेल्स ने ट्रोल करना शुरू कर दिया। भ्रामक और तथ्यहीन खबरों ने मनुष्यता को खंडों में तोड़ना शुरू कर दिया।एंटरटेनमेंट की जो खुराक बासी पड़ने लगी थी उसको फेसबुक और ट्वीटर जैसे माध्यमों ने नमक मिर्च लगाकर चटकारे लेने लायक बनाया और बाज़ार में परोस दिया।किसी भी एक खंड से सत्य को देखना कितना भयावह हो सकता है इसकी कल्पना लोगों ने नहीं की। लोगों को तात्कालिक अभिव्यक्ति के इस माध्यम ने खूब लुभाया। बिना जस्टिफिकेशन और जिम्मेदारी के एक माहौल तैयार कर देना बहुत आसान हो गया। लोकतंत्र की चुनावी प्रक्रिया तक इससे प्रभावित हुई। बहरहाल इनसब के बीच क्षेत्रीय माध्यम ज्यादा स्पष्ट और पारदर्शिता के साथ बने हुए हैं। लेकिन संसाधनों के अभाव में उनकी पहुँच बहुत कम है। दूसरा ये कि राष्ट्रीय स्तर की खबरों के लिए इनकी डिपेंडेंसी उन्हीं कॉर्पोरेट चैनलों के ऊपर बनी हुई है। दूसरी तरफ राष्ट्रीय स्तर के लगभग तमाम अखबारों का अपना वेब पोर्टल है। पाठक ये समझते हैं कि वो सच्ची खबरें पढ़ रहे हैं जबकि उसको पोर्टल पर डालने वाले की जिम्मेदारी सिर्फ इतनी भर है कि वो कोई भी खबर इस तरह से प्रस्तुत करें ताकि उनपर क्लिक आये। शुद्ध व्यापार है जिसको आमजन न्यूज़ समझ बैठे हैं। इन परिस्थितियों में आमजन को अपनी भूमिका तय करनी ही होगी। अपनी समझ , विवेक और क्षमता से रूटीन प्रोग्राम का हिस्सा नहीं बनना है। उसको वो ही माध्यम चुनना चाहिए जो उसकी समस्याओं को सत्ताधीशों तक पहुंचाए,उसके आक्रोश को सत्ताधीशों तक पहुंचाये और लोकतंत्र के प्रत्येक स्तम्भ से जवाबदेही की मांग करे।
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वल्लभ, आरा, बिहार



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http://bizooka2009.blogspot.com/2017/11/blog-post_24.html

1 टिप्पणी:

  1. वल्लभ जी ने तथ्यों के माध्यम से मीडिया के वर्तमान हालातों की गम्भीर पड़ताल की है । आलेख विमर्श को आगे ले जाने की मांग करता है । इस पर चर्चा होनी चाहिए ।

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