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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

29 अक्तूबर, 2017

वाज़दा ख़ान की कविताएं

वाज़दा ख़ान: चित्रकार व कवयित्री है। अनेक एकल चित्र प्रदर्शनियां लगी और  कई समूह प्रदर्शनियों में भागेदारी की है।  विभिन्न कार्यशालाओं और कला कैम्प में सहभागिता रही है।
 देश-विदेश में कलाकृतियों का संग्रह है।

वाज़दा ख़ान
कविताओं और रेखांकन तकरीबन सभी प्रतिष्ठित हिन्दी पत्रिकाओं और अखबारों में प्रकाशन हुआ है। अनेक पत्रिकाओं के आवरण पृष्ठ के लिये डिजाइनिंग किते है। कई पत्रिकाओं और अखबारों में कला लेखों का प्रकाशन हुआ है।
पहला कविता संग्रह "जिस तरह घुलती है काया", भारतीय ज्ञानपीठ से 2009 में प्रकाशित प्राप्त हुआ।
 "जिस तरह घुलती है काया", काव्य संग्रह पर 2010 में हेमन्त स्मृति सम्मान मिला।दूसरा कविता संग्रह "समय के चेहरे पर", शिल्पायन प्रकाशन, दिल्ली से 2015 में प्रकाशित है।तीसरा कविता संग्रह "जो सच नहीं", बोधि प्रकाशन, जयपुर में प्रकाशनाधीन है। सुप्रसिद्ध साहित्यकार राजी सेठ और सीनियर ग्राफिक्स आर्टिस्ट श्याम शर्मा समेत कई लोगों से साक्षात्कार। साल 2000 में त्रिवेणी कला महोत्सव (NCZCC इलाहाबाद) द्वारा सम्मानित।साल 2004-05 में ललित कला अकादमी, दिल्ली द्वारा अनुदान के रूप में गढ़ी आर्टिस्ट स्टूडियो में बतौर चित्रकार कार्य करने का अवसर



कविताएं

सत्य असत्य के बीच
समय की महीन सी लकीर
किस तरह चस्पां होती
माथे पर,
हर वक्त आंखों में
अन्धेरे को और गाढ़ा
करती, उजाले के एहसास में पगी।

सच, कितनी विद्रूपतायें, कितना पाखण्ड
और कितनी अनकही संवेदनायें
चिन देते हैं अपने भीतर,
बरअक्स चलती मूर्त दुनिया में
किसी भी रूप में बाहर नहीं
आना चाहतीं।

००


ऐसे नहीं आता उजाला
साथ अपने अन्धेरा भी लाता है
कई बार उजाले की चमक
अन्धेरे को उजला कर देती है
पर अन्धेरा
इससे चला नहीं जाता
जिन्दा रहता है अपने कई कई अदृश्य रूपों में
धरती की दरारों में।

दरारें गहरी होती, खाईं का
रूप धरती हैं जब
गिर जाता है उजाला धप्प से
घाटी में,
और शिखर बेहद ऊंचे होते हैं
बादलों में घुलते।

००


चित्र: अवधेश वाजपेई

चाहतें इतनी गहरी थीं
काली रातों से भी ज्यादा गहरी
कि कुछ सुझायी न दे
और इतनी गहरी कि घुल-मिल जायें
रक्त मज्जा के साथ कि ढूंढना
नामुमकिन हो जाये

कैसे दौड़ लगाती हैं चाहतें, देह में
धमनियों में, दौड़ते रक्त के साथ
कैसे तैरती हैं रूह के भीतर
अपने जज़्बात रख कर
जैसे आसमान में तैर रहे हों बादल
जैसे परिन्दों का झुण्ड, उड़ान भर रहा हो
जैसे क्षितिज पर समन्दर से, गले
मिल रहा हो सूरज

कैसी हैं चाहतें
क्या चाहतें वर्जनायें हैं ?
कैसे बेचैन होती हैं चाहतें, ज्वार भाटा सी
क्या वो भी चांद से बंधी हैं
बसेरा करते पन्छी, तीखी आवाज में चीखते
प्रतिरोध जताते, किसी अपशकुन से
क्या ऐसे ही चीखती हैं, अन्तर्मन में
बसेरा करतीं, चाहतें चुपचाप

कैसी हैं ये चाहतें, कर देती तबाह दुर्ग, किले
नगर, सभ्यतायें
नैतिकता/ अनैतिकता
मुनासिब/ गैर मुनासिब
दुनियावी फलसफों में बिछी चाहतें
आसमान में क्यूं ठौर बनाती हैं
क्या चाहतें वर्जनायें हैं ?

००

बार बार खुद को दोहराने के लिये
मुक्त करना जरूरी है खुद को

मैंने पूछा था तुमसे
मन का विदेह
होना, कैसे सम्भव है ?
तुमने कहा था चलती रहो
रात दिन के अन्धेरे उजालों में
बोध हो जाएगा तुम्हें, सृष्टि के
किसी छोर पर पहुंचकर

अबोल लिपी में लिखी जिन्दगी को
कैसे पढ़ा जा सकता है
और आकारों से कैसे मुक्त हुआ
जा सकता है,
शायद तब निरपेक्षता और सौन्दर्य का
सम्मिलन
तमाम सच्चाईयों को
गढ़ सके आसमान पर।

००


अनसुलझे-अज्ञात ना जाने कितने आकार

स्वप्न सच्चाईयों और बहुत अधिक जिन्दगी के साथ
बांध के पानी सा
मुझमें हरहराते, बाढ़ आनी तय थी
विध्वंस भी।
मैं धरती तक ही कहीं सफर
तय कर पायी थी
मेरे बहुत सारे उजाले
अन्धेरों की जकड़बंदी में थे

मैं सूरज चांद सितारों का
साथ चाहती थी
आकाशगंगाओं के बीच
खुद को रखकर
पवित्रता और शुद्धता के भावों का
रहस्य समझना चाहती थी

पर धरती से आगे के सफर का
रास्ता, मुझे पता नहीं

सूरज चांद सितारों का मौन और
सारी दुनिया में चमक जाने का गुरूर
सहस्रों कायनात के समकक्ष/ कैसे मुहैया
करते वे मेरे लिये रास्ता
इस अप्रासंगिक सी, अभिव्यक्ति पर।

००



चित्र: अवधेश वाजपेई


अधजली रात में, प्रवेश करती सुबह

सब्र ओ इंतेहां के पैमाने के साथ
अप्रतीक्षित कड़वेपन, धोखे का स्वाद
चख रही है
रात और दिन चलेंगे मनुष्य की
अंतिम पीढ़ी तक,
उसके बाद भी रात होगी
दिन भी पांव पसारेगा

सारी की सारी तबाहियां दर्ज की जायेंगी
आकाश को रोटी चकले जितना (श्यामपट्ट)
बोर्ड बनाकर

शब्दों में असहनीय पीड़ा का परथन
लगाकर, लोइयों सा बेल
शताब्दी के चूल्हों पर
सेंका जायेगा आहिस्ता आहिस्ता

बची हुयी सामग्री, किसी कचरा गाड़ी को
थमा दी जायेगी, डाल दी जायेंगी घूरे पर
जहां नहीं पहुंचेगा कभी
स्वीकारोक्ति का कोई प्रकाश

कहते हैं पॉलीथीन नष्ट नहीं होती
मिट्टी में दबाये जाने के बावजूद
तो क्या हमेशा कवच का काम करेगी ?

००


हम पत्थर की क्यूं ना हुई ?


बादलों के साथ सफर करते सूरज
रौशनी भरी थी आंखों में
रौशनी थी कि चुभ रही थी
पानी बनी जा रही थी आंखों में
गूंज रहा था कोई नाद
हम शर्मिंदा हैं...
कि हम पत्थर की क्यूं ना हुई
बिना श्राप के भी।
क्यूं भर दिए तमाम जज्बात, चोट
और खून के कतरे जिस्म में
क्यूं रची हमारे भीतर कायनात
हम शर्मिंदा हैं...
कि हम पत्थर की क्यूं ना हुई
क्यूं हम मेकअप से, लिपिस्टिक से
रंगी-पुती हैं, क्यूं हम तंग कपड़े पहनती हैं
क्यूं हम दिन-रातों में, घरों में, बाहर
चलने का दु:साहस करती हैं
हम शर्मिंदा हैं...
कि हम पत्थर की क्यूं ना हुई
हम जिस्म बनी, माल बनी, सौदा बनी
समझौता बनी, जायदाद बनी
आन-बान-शान बनी

हम शर्मिंदा हैं...
कि हम पत्थर की क्यूं ना हुई
हम घूंघट निकालती हैं
दुपट्टों से सिर ढकती हैं
पूरी आस्तीन की कमीज पहनती हैं
तुम्हारी हर ज्यादतियों को
खुद में जज्ब करती हैं
हम शर्मिंदा हैं...
कि हम पत्थर की क्यूं ना हुई
हम अकेले आसमान में नहीं उड़ना चाहती
हम उड़ना चाहती हैं तो ये चाहत भी
पालती हैं कि तुम साथ उड़ो
क्या हम शर्मिंदा हों अपनी चाहत पर
या कि इस सोच पर
कि इससे पहले हम-
पत्थर की क्यूं ना हुई
या खुदा तूने हमें क्यूं बनाया
गर बनाया भी तो इस जहान में भेजा क्यूं
तमाम संवेदनाओं में रंगकर
हम शर्मिंदा हैं...
कि हम पत्थर की क्यूं ना हुई
हम अपने लड़की होने का शोक मनाएं
कॉन्फेशन करें, क्या करें हम
लड़की होना गर कुसूर है हमारा
तो सीता, मरियम
आयशा को भूलकर
हम शर्मिंदा हैं...
कि हम पत्थर की क्यूं ना हुई

एक ऐसी कविता
जिसमें दर्द है / दु:ख है / आंसू है
पीड़ा है / आधी सदी है
मैं शर्मिंदा हूं...
लिखने से पहले
कि मैं पत्थर की क्यूं ना हुई।
(ये कविता दिल्ली गैंगरेप पीड़ित लड़की को समर्पित...जो आसमान का कोई तारा बन गई)

००


हम लड़कियां

हम लड़कियां मान लेती हैं
तुम जो भी कहते हो
हम लड़कियां शिकवे-शिकायतें
सब गुड़ी-मुड़ी कर
गठरी बनाकर आसमान में
रुई के फाहे सा
उड़ते बादलों के ढेर में
फेंक देती हैं
कभी तुम जाओगे वहां
तो बहुत सी ऐसी गठरियां मिलेंगी

हम लड़कियां
देहरी के भीतर रहती हैं
तो भी शिकार होती हैं
शायद शिकार की परिभाषा, यहीं से
शुरू होती है

हम लड़कियां
छिपा लेती हैं अपना मन
कपड़ों की तमाम तहों में
उघाड़ते हो जब तुम कपड़े
जिहादी बनकर
मन नहीं देख पाते हो

हम लड़कियां
कितना कुछ साबित करें अपने बारे में
हर बार संदिग्ध हैं
तुम्हारी नजरों में

हम लड़कियां
बन जाती हैं तुम्हारे लिए
भूख-प्यास
बन जाती हैं तुम्हारे लिए
आजीवित प्राणी
तुम उन्हें उछाल देते हो
यहां-वहां गेंद की तरह

हम लड़कियां
धूल की तरह
झाड़ती चलती हैं
तुम्हारी उपेक्षा, तिरस्कार, अपमान
तब जाकर पूरी होती है कहीं
तुम्हारी दी हुई आधी दुनिया।

००

चित्र:अवधेश वाजपेई


सुनो मेरी चाहतों

सुनो मेरी चाहतों
पूरी ताकत से अंगड़ाई लो
मेरी जिस्म में
खिला दो दिलो-दिमाग में
तमाम किस्म के फूल
तैरा दो प्रबल प्रवाह के साथ
ज्वालामुखी के नन्हें-नन्हें द्वीप
ज्वार-भाटा के समंदर में
पोर-पोर में भर दो रंगों का नशीला राग
धरती के कण-कण में भर दो
मेरे जज्बात
खोल दो तमाम जकड़ी हुई निराशाओं को
बांधती हैं जो मेरे वजूद को
चादर में बंधे सूखे कपड़े सा

सुनो! आवारगी सी बहती हुई हवाओं
सुनो! आंधी बनकर मुझमें बहो
चूर कर दो अपने आलिंगन में
मगर मुट्ठियों में मंजिल का रास्ता
माथे की लकीरों सा नक्श रहे

सुनो! ब्रह्मांड में बची तमाम अनगढ़
अनतराशी चाहतों (ख्वाहिशों)
पूरी ताकत से मुझमें प्रवेश करो
उखड़ जाएं चाहे मेरे पांव
मगर मुझमें उत्कीर्ण करो दमकता
घना-घना होता विशुद्ध सच्चा संवाद
और भाव शून्यता और निष्क्रियता में
लिपटे पलों को, जो मुझमें
किसी समंदर में बहती निर्मम लहरों सा
सांस ले रहे हैं
वहशी अंदाज में ले जाकर
पटक दो दोजख में

सुनो मेरी चाहतों
पूरी ताकत से रूपान्तरण करो
भावनाओं के स्तर पर जीवन के
महान सत्यों का
जो रच दें देह/  आत्मा में
अपरिभाषित आनन्द को/  ऊर्जा को
ताकि किसी भूचाल के बाद वे
बदले परिदृष्य को आसानी से
जज्ब कर लें नई हरियाली कोपलों में

सुनो मेरी नई चाहतों
अपनी नन्हीं-नन्हीं कोपलों के साथ
मुझे अपनी बाहों में उठाओ
लिटा दो मुझे किसी गीले ऊंचे इरादों के
दरख्त पर कि तड़प भरी सिसकियों के
असंख्य उम्मीद के संग गूंजता रहे
मजबूत इरादों का मखमली स्पर्श

सुनो मेरी नई चाहतों
मैं सीप में ढल जाती हूं
तुम बंद हो मुझमें
श्वेत मोतियों सा
डोलो तुम ब्रह्मांड के आदिम
समंदर में यहां-वहां
टकराओ किसी भी चट्टान से
कभी तट पर आ लगो
कभी धंस जाओ गहराई में
पर प्रशस्त करते रहना
अपने पूरे सामर्थ्य से
मेरे भीतर की स्त्री को
जो विषम परिस्थितियों में भी
उल्लास के गीत गाना चाहती है।

००

चित्र: अवधेश वाजपेई

आधी जमात का सच

एक सीप में तीन लड़कियां रहती थीं
हरी, नीली और पीली
रंग, खुशबू, शबनम और सितारों की
जन्नत में

रफ्तार के संग दौड़तीं
कायनात के इस छोर से उस छोर तक
कभी-कभी उतर आता उनके होठों पर
उदास रंग।
कभी उनके सपने मु्र्दा जिस्म में
बदल जाते
अवाक हो जातीं वे
कहां जा पहुंची उनकी परिक्रमा
बनाया तो था ख्वाहिशों का नक्शा
जन्नत के पांव तले
पर जल जाते उनके पांव
जब तेज रफ्तार में दौड़तीं वे काली सड़कों पर

नक्शे में खुदी पगडंडियों को
ढूंढने का प्रयास करतीं
मैंने कई बार देखा है उन्हें
जब वे उतरती हैं खुशबू, रंग, शबनम
सितारों के साथ
आसमान में

ऊर्जा से लबालब, धैर्य और हिम्मत के
पंख उगाए, हाथों में उम्मीद की
सुनहरी छड़ी लिए
टप्प से टकराती उनकी मासूमियत
कठोर कंकरीली-पथरीली जमीन से

जारो-कतार बहती संघर्षों की नदी में
बुझ जाते उनकी आंखों के दीये
बदहवास हो जाते उनके चेहरे
स्याह सा दुपट्टा सिर पर लिए
पीछे मुड़कर देखते हुए मुस्करातीं
उदास मुस्कराहट के साथ
अतीत से गुंथा वर्तमान
हावी हो जाता भविष्य़ पर
लट्टू की तरह घूमता समय
कीली पर नचाता उनको।

विवश हैं वो नाचने को
अपनी धुरी पर गोल-गोल
चक्कर लगाने के लिए-
जब तक वे अपनी धुरी पर
गश खाकर गिर न पड़ें

तब लगता है कि क्या ये सच हो सकता है
क्या सकारात्मक हो सकता है
कि एक सीप में तीन लड़कियां
रहती थीं हरी, नीली और पीली
खुशबू, रंग, शबनम और सितारों की जन्नत में

ये शायद ऐसे सच हो सकता है
ऊर्जा से लबालब, सब्र और हिम्मत के
पंख के साथ, हाथों में उम्मीद की छड़ी लिए
अपनी धुरी पर ही उन तमाम यातनाओं को
पूरी ताकत से परे हटाकर
एक-दूसरे से सुनगुन करतीं
उन्हीं पगडंडियों पर बढ़ जाती हैं
नंगे पांव ही सही, धीरे-धीरे ही सही
खुद ही ढूंढती हैं अपना सहर
खुद ही आवाज देती हैं किरन को
खुद ही चांद के माथे पर
रखती हैं उम्मीद की छड़ी
खुद ही रजनीगंधा के फूलों को उठाकर
धर लेती हैं सांसों पर
उसकी खुशबू के संग खुद खुशबू बनकर
फूल सी खिलती हैं
टिकाती हैं अपने सपने पहाड़ों पर
यह जानते हुए कि
हिमनद की हल्की सी बयार
उनके सपनों को तोड़ती-फोड़ती
पटक देगी किसी घाटी में ले जाकर

लेकिन उन्हें तो बीनना है सितारे
उन्हें तो बनाना है पनाहगाह
उन्हें तमाम लड़कियों के लिए
जो सीपियों में बंद हैं
सहस्राब्दियों से, मिस्र की ममी सी, न जाने
कितने सौन्दर्य के रंगों में ढली हुई

हां, यही तो है उम्मीदों की सुनहरी सदी
दुनिया की आधी जमात को संग लिए
चलते हुए, बुनियादी फर्क को
सच साबित करने के लिए।
००

स्त्रियां
कभी फूल कभी पत्ती कभी डाल बन
तुममें खिलती स्त्रियां

कभी बादल कभी इन्द्रधनुष बन
तुम्हारे भीतर कई कई रंग
गुंजार करती स्त्रियां

आसमान में उड़ती सितारें ढूंढती
प्रेम में पड़ती स्त्रियां

नदी बनती समन्दर में समाती
तेज धूप में डामर की सड़कों पर चलती
सड़क बनाती स्त्रियां

अन्धेरी बावड़ी में सर्द पानी
और जमी काई बनतीं
वस्त्रों से कई कई गुना
लांछन पहनती स्त्रियां

बिन्दी माथे पर सजा दु:ख की लकीरों को
चेहरे की लकीरों में छुपाती स्त्रियां

सीवन उधड़ी और फीकी पड़ती
उम्मीदों को पुराने किले में कैद करतीं
बार बार नमी वाले बादलों से टकराती स्त्रियां

मुट्ठियों में रोशनी भरने पर भी
जमीन पर टप्पे खाते सम्बन्धों को
ज्वार भाटा में तब्दील होते देखतीं
खुद को तमाम आकारों धूसर शेड्स से
मुक्त करने की कोशिश करती स्त्रियां

उन तमाम शब्दों के अर्थ में
जिनमें वे 'मोस्ट हंटेड और वॉन्टेड' हैं
(शिकार और चाहत)
में घुली कड़वाहट को निगलने की
कोशिश करती स्त्रियां

क्या सोचती हैं तुम्हारे बारे में
मुस्कुराती हैं दबी दबी हंसी
हंसती हैं जब स्त्रियां

कायनात की तमाम
मुर्दा सांसों में इत्र उगाती स्त्रियां।
००


                                  

1 टिप्पणी:

  1. अच्छी कविताएं।
    हम पत्थर क्यों न हुईं और आधी जमात का सच बेहतरीन कविताएं हैं। अवधेश वाजपेई के बढ़िया चित्र हैं।

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